संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। मुकंद लाल जिला नागरिक अस्पताल में थैलेसीमिया से ग्रस्त मरीजों के लिये थैलेसीमिया में बोन मैरो ट्रांसप्लांट जागरूकता कार्यशाला हुई। आयोजन ग्लोबली इंटीग्रेटेड फाउंडेशन फॉर थैलेसीमिया ने फोर्टिस मेमोरियल शोध संस्थान गुरुग्राम व इनर व्हील कल्ब ऑफ यमुनानगर के सहयोग से कराया। साथ ही अस्पताल में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर गर्भवती महिलाओं के लिए छह दिवसीय विशेष योग शिविर भी लगाया गया। शिविर 15 से 21 अप्रैल तक चलेगा।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि यमुनानगर विधायक घनश्याम दास अरोड़ा रहे। उनके साथ भाजपा जिलाध्यक्ष राजेश सपरा, सिविल सर्जन डॉ. पूनम चौधरी, प्रधान चिकित्सा अधिकारी डॉ. नवजोत किरण टिवाना, जिला आयुर्वेदिक अधिकारी डॉ. प्रतिभा भाटिया व अन्य अधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान फोर्टिस मेमोरियल शोध संस्थान गुरुग्राम से बाल चिकित्सा व बीएमटी के प्रधान निदेशक डॉ. विकास दुआ ने मरीजों को थैलेसीमिया व बोन मैरो ट्रांसप्लांट के बारे में बताया।
योगाचार्य शिव कुमार ने योग के बारे में जानकारी दी। इनर व्हील क्लब की अध्यक्ष नीलिमा सैनी व परियोजना अध्यक्ष पारूल खन्ना ने सभी का स्वागत किया। कार्यशाला में मौजूद थैलेसीमिया से ग्रस्त मरीजों व गर्भवती महिलाओं की जांच भी की गई तथा योगाभ्यास के बारे में जानकारी दी गई। विधायक घनश्याम दास अरोड़ा ने कहा कि सरकार स्वास्थ्य के क्षेत्र में पूर्ण प्रयासरत है। विशेषकर थैलेसीमिया से ग्रस्त मरीजों के लिए हर संभव सहायता दी जा रही है।
सिविल सर्जन डॉ. पूनम चौधरी ने कहा कि अस्पतालों व स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रयासों व सहयोग से स्वास्थ्य विभाग इस प्रकार के रोगों से ग्रस्त मरीजों को पूर्ण जागरूकता के साथ उपचार उपलब्ध करा सकता है। मरीजों को उचित जांच व बोन मैरो ट्रांसप्लांट द्वारा लाभ प्राप्त होगा। सभी मरीजों को जांच अवश्य करानी चाहिए।
डॉ. विकास दुआ ने बताया कि थैलेसीमिया के मरीजों को समय-समय पर रक्त चढ़ाना पड़ता है, जिसके कारण शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ती है। आयरन की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए भी मरीजों को दवाएं लेनी पड़ती है, जिनका प्रभाव मरीजों पर पड़ता है। इस प्रकार के मरीजों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट द्वारा उपचार संभव है, पर इसके लिए पूर्ण जांच आवश्यक है।
साथ ही कम आयु में बोन मैरो ट्रांसप्लांट कराना अधिक लाभदायक होता है। आठ वर्ष से कम आयु के बच्चों को इसका अत्यधिक लाभ प्राप्त होता है। 18 वर्ष तक के मरीजों में भी यह लाभप्रद होता है, पर अधिक आयु के मरीजों में इसका प्रभाव अनुकूलता अनुसार होता है।