संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। संत शिरोमणि श्री गुरु रविदास जी महाराज का 649वां प्रकाशोत्सव पहली फरवरी को पूरे श्रद्धा-उत्साह के साथ मनाया जाएगा। जिले के कपालमोचन का गुरु रविदास जी महाराज से गहरा ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संबंध रहा है। यहां आज आस्था का सैलाब उमड़ेगा।
ग्रंथों के अनुसार वर्ष 1515 ईस्वी में गुरु रविदास जी काशी से पंजाब के खुरालगढ़ साहिब जाते समय दो दिन और एक रात के लिए कपालमोचन में ठहरे थे। इस दौरान उन्होंने यहां पहुंचे श्रद्धालुओं को उपदेश दिए और सत्संग भी किया। सैकड़ों वर्ष पहले जहां उनके पावन चरण पड़े, आज उसी स्थान पर भव्य मंदिर स्थापित है, जहां रोजाना श्रद्धालुओं की कतारें लगती हैं। कपालमोचन स्थित गुरु रविदास मंदिर, डेरा बाबा लाल दास के प्रांगण में एक प्राचीन कुआं आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। बताया जाता है कि जब मंदिर के नए भवन के लिए खुदाई हो रही थी, तब अचानक जेसीबी से जोरदार आवाज आई। जांच करने पर वहां गहरा कुआं मिला।
मंदिर के महंत निर्मल दास के अनुसार, गुरु रविदास जी महाराज ने अपने प्रवास के दौरान इसी स्थान पर गड्ढा खोदकर जल ग्रहण किया था। मंदिर सभा की ओर से यहां कुंई नामक शिला स्थापित की गई है। श्रद्धालु इस जल को पवित्र मानते हुए आचमन करते हैं और कई लोग इसे गंगा जल के समान मानकर अपने घर भी ले जाते हैं।
गुरु रविदास मंदिर सभा के प्रबंधक अमरनाथ ज्ञासड़ा के अनुसार प्रकाशोत्सव के बाद आने वाले पहले रविवार यानी 8 फरवरी को प्रदेश स्तरीय कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस अवसर पर दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। नवंबर में गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व के बाद यह दूसरा अवसर होता है, जब कपालमोचन में इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। कार्यक्रम में यमुनानगर सहित प्रदेश के कई जिलों के अलावा देहरादून, बिजनौर, पंजाब, चंडीगढ़ और राजस्थान से भी श्रद्धालु पहुंचेंगे।
छोटे डेरे से भव्य मंदिर तक की यात्रा
आज जहां भव्य गुरु रविदास मंदिर श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, वहां कभी मात्र 10 फीट चौड़ा चूने का एक कमरा हुआ करता था। यह कमरा आश्रम के रूप में उपयोग में था और आज भी मंदिर परिसर में सुरक्षित है। शुरुआती दौर में यहां जंगल हुआ करता था और साढौरा की ओर जाने वाली सड़क भी नहीं थी। समय के साथ महंत कृपा दास, लाल दास, जमन दास, मूल दास, सुखदेव दास, सूरज दास और राम दयाल जैसे महंतों ने इस स्थल की सेवा की। वर्तमान में महंत निर्मल दास मंदिर की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।