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पहलवान फिर दांव लगाकर कोरोना को करेंगे चित

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दंगल में भिड़ते पहलवान फाइल फोटो - फोटो : Sonipat
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अंकित चौहान
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सोनीपत। दंगलों में सबसे पहले अपना दम दिखाने वाले पहलवानों पर कोरोना का दांव भारी पड़ रहा है और कोरोना के इस दांव से पहली बार दंगल में पहलवान चित हो गए हैं, क्योंकि प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले दंगलों से उभरते पहलवानों को बड़ा सहारा मिलता था। उनको अपना दम दिखाने का सबसे पहले इन दंगलों में मौका मिलता था। कोरोना संक्रमण शुरू होने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में दंगल बंद हो गए हैं और इन दंगलों में जीतकर मिलने वाली आर्थिक मदद भी खत्म हो गई।
हालांकि इन दंगलों में दम दिखाने के बाद देश के लिए पदक जीतने वाले पहलवानों, अंतरराष्ट्रीय कोच, अखाड़ा संचालकों सभी का मानना है कि कोरोना को दांव लगाकर हराया जाएगा और दंगल दोबारा से शुरू होकर पुराने रंग में दिखाई देंगे।
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यहां अधिकतर पहलवान गांवों से निकले हैं और उनकी शुरुआत दंगल से होती है। देश के लिए खूब पदक जीतने वाले अधिकतर पहलवानों ने शुरुआत में दंगलों में जोर आजमाइश की है। देश के मशहूर पहलवान चंदगीराम भी दंगल में खूब खेले थे तो गीता फौगाट, बबीता, विनेश फौगाट, साक्षी मलिक, सरिता, अंशु, सोनम, योगेश्वर दत्त, बजरंग पूनिया, रवि दहिया, मौसम खत्री समेत अधिकतर पहलवानों ने शुरुआत में दंगलों में हाथ आजमाए और वहां जीत दर्ज करके खूब नाम भी कमाया। जिसके बाद इन सभी प्रतिभाओं ने कड़ी मेहनत करते हुए आगे कदम बढ़ाए और इनमें से कई पहलवानों ने देश के लिए ओलंपिक तक पदक जीते। गांवों में मनोरंजन से लेकर प्रतिभाओं को आगे लाने की अहम कड़ी साबित होने वाले यह दंगल कोरोना के कारण पिछले एक साल से ज्यादा समय से पूरी तरह बंद हैं, जबकि उससे पहले सामाजिक व धार्मिक संगठनों के साथ ही समाजसेवी, खाप आदि दंगलों के खूब आयोजन कराते थे और उनमें देशभर के पहलवान हिस्सा भी लेते थे। हर किसी को उम्मीद है कि कोरोना संक्रमण खत्म होने पर दंगल दोबारा से शुरू होंगे और पहलवानों को शुरुआती मंच दोबारा से मिलेगा।
पहलवानों को मिलती है आर्थिक मदद तो हिंद व भारत केसरी भी होते हैं तय
ग्रामीण क्षेत्रों में कराए जाने वाले इन दंगलों का पहलवानों को सबसे बड़ा फायदा यह भी होता है कि उनको जहां शुरुआत में जोर आजमाइश का मौका मिलता है, वहीं उनको जीतने पर आर्थिक रूप से मदद भी मिलती है, जिसके सहारे वे अपना अभ्यास बेहतर कर सकते हैं। क्योंकि वह मदद भी कोई कम नहीं होती है, बल्कि दंगलों में लाखों रुपये इनाम में दिए जाते हैं। दंगल में तय कर दिया जाता है कि उसमें कितनी कुश्तियां कराई जाएंगी और उनमें कितने लाख के नकद इनाम दिए जाएंगे। हर कुश्ती पर यह भी तय होता है कि किस कुश्ती को जीतने पर कितने रुपये का इनाम मिलेगा। दंगलों में सबसे बड़ी कुश्ती का इनाम एक लाख रुपये से 10 लाख रुपये तक होता है। इसके साथ ही दंगलों से हिंद व भारत केसरी का खिताब भी तय होता है। उसके लिए अलग से कुश्ती कराई जाती है और जीतने वाले पहलवान को हिंद केसरी व भारत केसरी का खिताब दिया जाता है।
कोरोना काल में किसी तरह व्यायाम हो रहा, दंगल पूरी तरह से बंद
कोरोना संक्रमण के बीच पहलवान किसी तरह से शरीर को फिट रखने के लिए व्यायाम जरूर कर रहे हैं, लेकिन दंगल पूरी तरह से बंद हैं। क्योंकि सरकार के कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए नियमों के तहत कोई भी खेल गतिविधि कराने पर रोक लगाई गई थी। उसमें बीच में कुछ छूट जरूर मिली, लेकिन उसके बावजूद हालात पूरी तरह से ठीक नहीं हुए, जिससे दंगल शुरू नहीं हो सके तो अब दोबारा से कोरोना संक्रमण बढ़ने पर ऐसी गतिविधियों पर रोक लग गई। इस तरह एक साल से ज्यादा समय से दंगल नहीं हो रहे हैं।
वर्जन
कुश्ती की शुरुआत में जब किसी भी जगह दंगल होने का पता चलता था तो वहां खेलने चले जाते थे, जिससे हम यह देख सके कि हमारे अंदर कितना दम है और जब शुरुआत में दंगल में पहलवान जीत जाता है तो उससे हौसला भी बढ़ता है। दंगलों से कुश्ती के लिए रुझान भी बढ़ता है और पहलवानों को अभ्यास के लिए आर्थिक मदद भी मिलती है। गांवों में इन दंगल के सहारे ही कुश्ती को बड़ी पहचान मिली है। अब कोरोना के कारण दंगल नहीं होने से नए पहलवानों के लिए समस्या जरूर है, लेकिन कोरोना खत्म होने के बाद दंगल दोबारा से शुरू हो सकेंगे।
- बजरंग पूनिया, अंतरराष्ट्रीय पहलवान
हमारे यहां शुरुआत में पहलवान दंगलों में जाकर ही खेलते हैं और वहां जीतने के बाद हौसला बढ़ता है। जिससे पहलवान के अंदर से खेलने की भावना पैदा होती है। हम खुद भी जब छोटे थे तो दंगल देखने के लिए काफी दूर-दूर तक चले जाते थे और उसके बाद खुद भी दंगलों में खेलते थे। दंगल ही पहलवानों के लिए कुश्ती की शुरुआती कड़ी है।
- मौसम खत्री, अंतरराष्ट्रीय पहलवान
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दंगलों का ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत ज्यादा क्रेज है तो दंगल के सहारे ही स्थानीय बच्चों को अभ्यास करने के लिए आर्थिक मदद मिल जाती है। दंगलों में लोग कुश्ती देखने आते हैं तो उनका खेल के प्रति रुझान बढ़ता है और वह अपने बच्चों को पहलवान बनाने के लिए अभ्यास शुरू कराते हैं। कुश्ती में अधिकतर बच्चे गांव से निकलते है।ं यह उम्मीद है कि कोरोना खत्म होने से दंगल दोबारा शुरू होंगे।
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- वीरेंद्र मलिक, अंतरराष्ट्रीय रेफरी
दंगल होने से पहलवानों को शुरुआत में अभ्यास करने के लिए आर्थिक सहायता मिलती है। क्योंकि जब कोई बड़ा पहलवान बन जाता है तो उसे देश के लिए पदक जीतने पर सरकार की तरफ से भी हर सुविधा व पैसा मिलता है। लेकिन पहलवानों के लिए शुरुआत में इन दंगलों से सबसे ज्यादा सहायता मिलती है। इसके साथ ही पहलवान का इन दंगलों से आकलन हो जाता है कि उसका अभ्यास ठीक हो रहा है या वह केवल खानापूर्ति कर रहा है। उम्मीद है कि दंगल दोबारा से शुरू होने पर पहलवानों को फायदा होगा।
- धर्मबीर दहिया, कुश्ती कोच व अखाड़ा संचालक
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