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पदक की उम्मीद लगाए बैठे हॉकी खिलाड़ियों के परिजन नहीं रोक पाए आंसू

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सोनीपत। टोक्यो ओलंपिक में शुक्रवार को कांस्य पदक के लिए हुए मुकाबले में महिला हॉकी टीम को भले ही हार का सामना करना पड़ा हो, लेकिन सभी खिलाड़ियों ने अपने संघर्ष से खेल प्रेमियों को अपना कायल बना लिया। बेटियां मैच के बाद मैदान पर नम आंखों में हार का दर्द छिपाने का प्रयास कर रही थीं, वहीं पदक की उम्मीद लगाए टीवी पर मैच देख रहे परिजन भी अपने आंसू नहीं रोक पाए।
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हालांकि खेल प्रेमियों ने खिलाड़ियों के कहा कि नाउम्मीद हो चुकी हॉकी को देश में एक बार फिर नई पहचान दिलाने का काम किया है। भविष्य में और बेहतर होगी टीम। खिलाड़ियों का यह प्रदर्शन हॉकी की दशा व दिशा तय करेगा।
रुंधे स्वर में नेहा की मां बोलीं - पदक का सपना टूट गया
महिला हॉकी टीम का मैच शुरू होने से पहले भगवान की पूजा-अर्चना कर टीम की जीत के लिए प्रार्थना की थी। पूरी उम्मीद थी कि टीम पदक जीतकर लौटेगी, लेकिन सपना टूट गया। टीम को आज भाग्य का साथ नहीं मिला। अगर मिलता तो नजारा दूसरा होता।
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- सावित्री देवी, नेहा गोयल की मां
हार के साथ भूख भी चली गई
सुबह ही मैच देखने के लिए टीवी के सामने बैठ गए थे। मैच के बाद भोजन खाना था, लेकिन लाडलियों के मैच हारने के साथ भूख भी चली गई। खाना खाने का भी मन नहीं हुआ। पूरी उम्मीद थी कि बेटियां पदक जीतकर लाएंगी, लेकिन सपना टूट गया। हार-जीत खेल का हिस्सा हैं। एक बेहतर टीम के खिलाफ सभी ने जीत के लिए संघर्ष किया, यही बड़ी बात है। मैच के बाद नेहा से फोन पर बात की तो वह भी रो रही थी। उसे दिलासा दिया है कि सभी खिलाड़ियों ने बेहतर काम किया है। मायूस न होकर आगे के लिए बेहतर तैयारी करना।
- श्याम सुंदर गोयल, नेहा गोयल के ताऊ।
हॉकी को नए मुकाम तक पहुंचाने में कामयाबी हासिल की
पूरी उम्मीद थी कि महिला हॉकी टीम देश के लिए कांस्य पदक जीतकर ही लौटेगी, लेकिन कड़े संघर्ष के बाद भी वह नाकाम रही। बेटियों के मैच हारने का हम सभी को बहुत दुख है। खुशी इस बात की है कि इन्होंने हॉकी को नए मुकाम तक पहुंचाने में कामयाबी हासिल की है। मैच के दौरान गोल रोकने के प्रयास में निशा को जोर से गेंद लगी थी। फोन पर बेटी से लगी चोट के बारे में पूछा तो उसने रुंधे स्वर में कहा कि-चोट का नहीं, मैच हारने का दर्द ज्यादा है।
- शोहराब, निशा वारसी के पिता
टीम पिछड़ी तो पढ़ने लगी थी नमाज
महिला हॉकी टीम मैच के शुरुआती दौर में 2-0 से पिछड़ी तो उसी दौरान उठकर नमाज पढ़ने चली गई थी। टीम ने वापसी तो की, लेकिन कई मौकों पर विपक्षी टीम को हावी होने का मौका दे दिया, जिससे बेटियों के पदक जीतने का सपना टूट गया। सभी बेटियां बेहतर खेलीं, लेकिन पदक के सपने को पूरा नहीं कर सकी। पदक न जीत पाने का मलाल जरूर है, लेकिन खुशी इस बात की है, टीम हॉकी को नई पहचान दिलाने में कामयाब हो गई।
- मेहरून, निशा वारसी की मां
बेहतर टीम के खिलाफ शानदार प्रदर्शन
कांस्य पदक के लिए खेला गया यह जबरदस्त मैच था। शुरुआत में ही 2-0 से पिछड़ने के बाद टीम ने दूसरे क्वार्टर में जबरदस्त वापसी की। चार मिनट के अंदर तीन तीन गोल करते हुए विपक्षी टीम पर एक गोल की बढ़त बनाकर खिलाड़ियों ने दिखा दिया कि वे यहां तक ऐसे ही नहीं पहुंची हैं। टीम भले हार गई हो, लेकिन सभी खिलाड़ियों ने बेहतरीन खेल दिखाया।
- धर्मप्रकाश आर्य, प्राचार्य, प्रताप स्कूल।
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सालों बाद बेहतर प्रदर्शन काबिलेतारीफ
महिला हॉकी टीम की सभी खिलाड़ी पूरे जुनून के साथ खेलीं। इसमें हार वाली कोई बात नहीं है। सालों बाद बेहतर प्रदर्शन काबिलेतारीफ है। सभी खिलाड़ी जितना दे सकती थीं, उतना दिया है। ग्रेट ब्रिटेन बेहतर टीम थी, फिर भी कड़ी टक्कर दी है। खिलाड़ियों के इस प्रदर्शन से हॉकी को लाइफलाइन मिल गई है। टीम को आने वाले समय के लिए शुभकामनाएं।
सुरेंद्र सिंह जून, फुटबाल कोच
सुनहरा है इस टीम का भविष्य
महिला हॉकी टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए पहली बार सेमीफाइनल में जगह बनाकर इतिहास रच दिया था। टीम इससे पहले सिर्फ दो बार ओलंपिक खेली है। 1980 में टीम टॉप-4 में पहुंची थी। उस समय सेमीफाइनल फॉर्मेट नहीं था। वहीं 2012 रियो ओलंपिक में टीम 12वें स्थान पर रही थी। इस टीम का भविष्य बेहतर है। आने वाले समय में टीम देश का नाम रोशन करेगी।
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- प्रीतम सिवाच, कोच एवं पूर्व कप्तान, भारतीय महिला हॉकी टीम
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