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Sonipat News: राष्ट्रीय ब्राह्मण महासंस्था ने एक नवंबर को दिवाली मनाने का लिया निर्णय

Sat, 26 Oct 2024 04:04 AM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
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सोनीपत। कैलाश कॉलोनी स्थित शिव मंदिर में शुक्रवार को राष्ट्रीय ब्राह्मण महासंस्था परशुराम सेना की बैठक हुई। अध्यक्षता शंभू दयाल मंदिर के मुख्य पुजारी डॉ. राजेंद्र प्रसाद त्रिपाठी ने की। सभी ने सर्वसम्मति से 1 नवंबर दिवाली पर्व मनाने का निर्णय लिया।
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डॉ. राजेंद्र प्रसाद त्रिपाठी ने बताया कि हमेशा दिवाली पर्व प्रदोष व्यापिनी कार्तिक कृष्ण की अमावस्या के दिन मनाई जाती है। पुराण के कथन के अनुसार विक्रम संवत 2081 में कार्तिक कृष्ण पक्ष में 31 अक्तूबर को चतुर्दशी अपराह्न दोपहर 3:53 तक रहेगा, जबकि सूर्यास्त शाम 5:40 बजे होगा। वहीं 1 नवंबर को अमावस्या शाम 6:17 बजे तक रहेगी। इस दिन सूर्यास्त शाम 5:40 बजे होगा अर्थात इस वर्ष अमावस्या 31 अक्तूबर व 1 नवंबर दोनों दिन व्याप्त है।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि यदि अमावस्या दोनों दिन प्रदोष को स्पर्श न करें तो दूसरे दिन ही लक्ष्मी पूजन करना चाहिए। सभी ग्रंथों का सार है कि अमावस्या दूसरे दिन प्रदोषकाल में एक घटी से अधिक व्याप्त है तो प्रथम दिन प्रदोष में संपूर्ण व्याप्ति को छोड़कर दूसरे दिन प्रदोषकाल में महालक्ष्मी पूजन करना चाहिए, लेकिन कहीं भी ऐसा लेख नहीं मिलता है कि दो दिन प्रदोष में व्याप्ति है तो अधिक व्याप्ति वाले प्रथम दिन लक्ष्मी पूजन करना चाहिए। निर्णय लिया गया कि 1 नवंबर को महालक्ष्मी पूजन (दिवाली) किया जाना शास्त्र सम्मत है। बैठक में पंडित अमित शौनक, जितेंद्र शास्त्री, विपिन, सुरेश, जितेंद्र, शीलदेव, हेमंत शर्मा, तिलक देव व पंडित प्रेमचंद मौजूद रहे।
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तिथि दो दिन कर्मकाल में हों तो युग्मानुसार होता है निर्णय



उन्होंने बताया कि निर्णय सिंधू प्रथम परिच्छेद के पृष्ठ 26 के अनुसार जब तिथि दो दिन कर्मकाल में विद्यमान हों तो निर्णय दोनों को जोड़कर (युग्मानुसार) किया जाता है। पुराण के अनुसार अमावस्या को प्रतिपदा युता ग्रहण महाफलदायी होता है। अर्थात पहले दिन चतुर्दशी युता अमावस्या ग्रहण की जाए तो महा दोष होता है। यह पूर्व में किए गए पुण्यों को नष्ट करता है। धर्म सिंधू में लेख है कि जहां सूर्योदय में व्याप्त होकर अस्तकाल के उपरांत एक घटिका से अधिक व्याप्त होकर अमावस्या हो, तब संदेह नहीं है। यदि अमावस्या दोनों दिन प्रदोष व्यापिनी हो तो उसे अगले दिन ही मनाना चाहिए, तिथि तत्व के अनुसार एक घड़ी रात्रि का योग हो तो अमावस्या दूसरे दिन होती है। तब प्रथम दिन छोड़कर अगले दिन सुखरात्रि होती है।
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