सोनीपत। कृषि कानूनों को रद्द कराने के लिए नेशनल हाईवे-44 जाम करके किसान सिंघु बॉर्डर पर डटे हैं। यहां पोस्ट ग्रेजुएट, इंजीनियरिंग, पीएचडी करके खेती चुनने वाले किसान सबसे आगे दिखाई दे रहे हैं। इन किसानों ने पहले नौकरी के लिए बेहतर पढ़ाई जरूर की, लेकिन खेती में बेहतर भविष्य दिखा और उसको ही चुन लिया। अब किसानों को खेती भी छिनने का डर सता रहा है। युवा किसानों का कहना है कि अपनी खेती को बचाने के लिए वह सड़क पर सोने को मजबूर हैं।
उच्च शिक्षा हासिल करके खेती को अपना भविष्य बनाने वाले काफी किसान वहां पहुंचे हैं। यह ऐसे किसान हैं, जिन्होंने कृषि कानूनों को पढ़ा और उनको कानून में आपत्ति मिली। यह किसान आंदोलन में तभी शामिल हुए हैं, जब उन्होंने कृषि कानून की खामियों को समझा। अब इन ग्रेजुएट व इंजीनियर किसानों की केवल एक ही मांग है कि इन कृषि कानूनों को रद्द किया जाए, क्योंकि उसमें एमएसपी व मंडी सिस्टम लागू रहने की कोई गारंटी नहीं है तो कारपोरेट सिस्टम पूरी तरह से लागू हो जाएगा। किसान तब तक यहां से नहीं हटेंगे, जब तक कृषि कानून रद्द नहीं हो जाते।
मैंने ग्रेजुएशन की है और उसके बाद भी नौकरी नहीं मिली। हमारे यहां छह एकड़ जमीन है, जिस पर खेती करता हूं। उसमें होने वाली फसल से केवल परिवार का गुजारा होता है। फसल के दाम पूरे नहीं मिलते हैं, जिससे बचत का मतलब ही नहीं होता। ऐसे में कृषि कानूनों से हालात काफी खराब हो जाएंगे और इनको रद्द कराने के लिए सड़क पर धरना देते है तो यहां रात में सो जाते हैं। कृषि कानून रद्द कराकर ही वापस जाएंगे। - सुशील कुमार, कुरुक्षेत्र हरियाणा
मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद खेती शुरू कर दी। क्योंकि परिवार के पास खेती ही गुजर-बसर का साधन है। फसलों के दाम पहले ही कम मिलते हैं और पूरी लागत तक नहीं मिलती है।अब कृषि कानून से खेती खत्म होने की कगार पर है। इसलिए ही सब कुछ छोड़कर बस कृषि कानून रद्द कराने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। जब तक कानून रद्द नहीं होंगे, तब तक आंदोलन में सबसे आगे खड़े रहेंगे। - अंकित दहिया, सोनीपत हरियाणा
एमए करके भी नौकरी नहीं मिली तो खेती कर रहा हूं। मेरे साथी कई पीएचडी किए हुए हैं, लेकिन वह भी खेती कर रहे हैं। खेती ही हमारा सब कुछ है और अब इसे भी सरकार छीन रही है। सरकार को इतना समझना चाहिए कि खेती के सहारे ही किसान व अन्य लोगों के परिवारों को रोटी मिल रही है। इसलिए कृषि कानूनों को रद्द करना चाहिए और इसके लिए हम हर तरह की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। - सुखचैन सिंह, पटियाला
मैंने इंजीनियरिंग की है, लेकिन हमारे यहां नौकरी ही नहीं है। इसलिए खेती करते हैं, जिससे परिवार का गुजारा हो जाता है। इतना पढ़कर खेती करनी पड़ रही थी और अब यह खेती भी सरकार छीन रही है। जिस तरह के कृषि कानून बनाए गए हैं, उनका हमें कोई फायदा नहीं होगा। बल्कि अब हम अपनी खेती को बचाने के लिए सड़कों पर समय काट रहे हैं। सरकार को हर हाल में हमारी मांगों को मानना पड़ेगा। - जगमिंदर सिंह, पटियाला
मैंने एमए तक पढ़ाई की है। पहले नौकरी करने का विचार था, लेकिन उम्मीद के अनुसार नौकरी नहीं मिली। जिससे खेती करनी शुरू कर दी और परिवार का गुजारा अच्छे से चल रहा था। लेकिन एक तरफ महंगाई बढ़ती जा रही है तो दूसरी तरफ फसलों का भाव कम होने से मुनाफा खत्म होता जा रहा है। अब कृषि कानूनों के कारण खेती खत्म होती दिख रही है और अपनी खेती बचाने को आंदोलन से जुड़े हैं। - गुरदयाल सिंह, पटियाला
मैं ग्रेजुएट हूं और पढ़ाई करके पहले सोचा कि नौकरी करेंगे, लेकिन किसी की नौकरी करने की जगह अपनी खेती करने लगे। पिछले चार साल से खेती कर रहे हैं तो अब हालात देखकर लग रहा है कि खेती से आगे परिवार का पेट भी नहीं भर सकेंगे। पहले ही फसलों से मुनाफा नहीं मिलता था तो अब नुकसान उठाने की नौबत आ गई है। - मंजीत सिंह, पटियाला