दिल को छू लेने वाला एक गाना है, ‘पंछी-नदिया, पवन के झोंके, कोई सरहद ना इन्हें रोके...’। ऑस्ट्रेलिया में रहकर हरियाणवियों के दिलों में धड़कते अरुण मलिक की सोच पर यह गाना एकदम फिट बैठता है। उनका लॉन्च किया गया कम्युनिटी रेडियो ऐप रेडियो कसूत विदेशी धरा पर आपणी बोली-आपणा बाणा के संदेश का दूत बना हुआ है। आज अंतरराष्ट्रीय प्रवासी दिवस पर हम इसी कहानी से रू-ब-रू करा रहे हैं।
सोनीपत में हुआ अरुण मलिक का जन्म
अरुण मलिक का जन्म 29 अप्रैल 1989 को हरियाणा के सोनीपत में हुआ था। पेशे से वह एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। साल 2008 में उच्च शिक्षा के लिए ऑस्टेलिया के ब्रिस्बेन गए थे। दो बच्चों के पिता अरुण अब देश-विदेश में हेल्दी लाइफस्टाइल को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत हैं। अब तक 23 बार ब्लड डोनेट कर चुके हैं। उनके अपना जंक्शन फाउंडेशन के 'साइकल चलाओ-प्रदूषण भगाओ', 'मेरा पेड़-मेरी पहचान' और 'बाल विकास' अभियान चल रहे हैं। इसके अलावा होनहार बच्चों को समय-समय पर प्रोत्साहित भी करते रहते हैं। अरुण बताते हैं कि वह आने वाले कुछ बरसों में कार को सोशल स्टेटस सिंबल मानने की सोच को बदलना चाहते हैं। अरुण का सपना है कि स्कूलों और कॉलेजों के आस-पास के माहौल को कम ट्रैफिक वाले इलाकों में बदल दें। हर स्टूडेंट के लिए बाइक स्टैंड लगाएंगे।