1971 में भारत ने पाकिस्तान को जंग के मैदान में हराकर विश्व इतिहास की सबसे बड़ी जीत दर्ज की थी। इस युद्ध में ढाका में पूर्व पाकिस्तान के कर्नल एके नियाजी के नेतृत्व में एक लाख पाक सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया था। इस जीत में जिले के 30 जवान जहां शहीद हुए, वहीं सैकड़ों ने अपना पसीना बहाया था। 44 साल बाद विजय दिवस की पूर्व संध्या पर पूर्व सैनिकों ने जंग के अनुभव अमर उजाला के साथ साझा किए।
पश्चिमी पाकिस्तान सीमा पर लड़ाई में आगरा एयरबेस था महत्वपूर्ण
मयूर विहार निवासी अमर सिंह महला मूलरूप से तिहाड़ गांव के रहने वाले हैं। महला ने बताया कि उसकी ड्यूटी जंग के समय आगरा की सीओडी यूनिट में थी, जहां से पश्चिमी पाकिस्तान की सीमा पर लड़ाई कर रहे सैनिकों के लिए युद्ध सामग्री से लेकर टैंक तक भेजे जा रहे थे। लड़ाई के दौरान आगरा एयरबेस से पांच फाइटर प्लेन ने उड़ान भरी। प्लेन ने पाकिस्तान की नाक में दम कर दिया। इसका असर पूर्वी पाकिस्तान के मोर्चे पर हुआ। हालांकि पांचों प्लेन वापस लौट कर नहीं आए। उन शहीद भाइयों की याद में आज भी आंसू आ जाते हैं।
तीन हजार बंदी भाग न जाए, इसलिए रात को एक पल भी नहीं लगती थी आंख
1991 में सूबेदार मेजर के पद से रिटायर अमर सिंह बताते हैं कि जब ढाका में पाकिस्तान के एक लाख सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया था तो तीन हजार पाक सैनिकों को ग्वालियर में रखा गया। वहां कैंप नंबर 60, 61 और 62 में बंद बंदियों की सुरक्षा और उन पर नजर रखने की जिम्मेदारी उनकी थी। कहीं बंदी भाग न जाएं, इसलिए रात को एक पल भी नहीं सो पाते थे। पूर्व सैनिकों ने पहले जंग में जीत के लिए खून और बाद में पकड़े गए सैनिकों की सुरक्षा के लिए पसीना बहाया। मोदी सरकार ने वन रैंक-वन पेंशन देने का वादा किया था, लेकिन अब तक लागू नहीं किया है। इसलिए वह सोमवार को विजयी दिवस पर होने वाले कार्यक्रम में भाग नहीं लेंगे।
आसोम से भी ढाका में लड़ रहे सैनिकों के लिए भेजी जा रही थी रसद
ब्रह्म कॉलोनी निवासी पूर्व सैनिक जयनारायण ने बताया कि उस समय उनकी ड्यूटी आसोम में थी। देश पाकिस्तान के साथ दो मोर्चों पर जंग लड़ रहा था। पूर्वी मोर्चे पर जंग लड़ रहे सैनिकों के लिए रसद और दूसरा सामान आसोम से भेजा रहा था। वहीं उनकी ड्यूटी लगी थी। हालांकि किसी भी समय अग्रिम मोर्चे पर लड़ने के लिए आदेश आ सकते थे। इसलिए हर समय तैयार रहने की हिदायत दी गई थी।
...जब ढाका जाकर समेटा बंदियों का सामान
छोटूराम कॉलोनी निवासी और सेना से हवलदार के पद से रिटायर रामफल ने बताया कि उसकी ड्यूटी उस समय नगालैंड में थी। अपने साथियों के साथ वह स्टोर संभाले थे। हालांकि अलर्ट था कि दुश्मन किसी भी समय रसद को निशाना बनाने के लिए हवाई हमले कर सकता है। इसके चलते हर पल अलर्ट रहना पड़ता था, लेकिन भारतीय सेना ने दो सप्ताह में ही जंग जीत ली। जब एक लाख पाक सैनिकों ने ढाका में आत्मसमर्पण किया तो उनकी ड्यूटी वहां सैनिकों का साजोसामान, गोला बारूद से लेकर दूसरी सामग्री कवर करने में लगी थी।
जिले के ये 30 जवान हुए थे शहीद
जिला सैनिक बोर्ड के मुताबिक 1971 की जंग में जिले के 30 जवान शहीद हुए थे, जिनमें रतनगढ़ निवासी तेजराम, जाट माजरा निवासी महावीर सिंह, सेहरी निवासी रणसिंह, फरमाणा निवासी तेज सिंह, रिढ़ाऊ निवासी रूपराम, मंडौरा निवासी रामफल, जसराना निवासी ओमप्रकाश, खेड़ी दमकन निवासी दीवान सिंह, गौरड़ निवासी करतार सिंह, पुगथला निवासी रामदास, मलिकपुर निवासी विलास, खेड़ी गुज्जर निवासी धर्मपाल, थाना कलां निवासी मातूराम, भैंसवाल कलां निवासी अजीत सिंह, कटवाल निवासी एसएस नरवाल, आहुलाना निवासी महावीर सिंह, शामड़ी निवासी रामचंद्र, गंगेसर निवासी प्रेमसिंह, राणाखेड़ी निवासी लखीराम, गढ़ी बला निवासी महेंद्र, नाहरी निवासी समुंद्र सिंह, नाहरा निवासी छोटूराम, राठधना निवासी सूरजमल, छतेहरा निवासी बनेसिंह, पुगथला निवासी दलीप सिंह, पुरखास निवासी रामपत और राजसिंह, भुर्री निवासी रामदिया, लाठ निवासी भगवान सिंह व चिटाना निवासी सतपाल सहित अन्य शहीद शामिल हैं।