सोनीपत। कृषि कानूनों को रद्द कराने के लिए 10 दिन पहले पंजाब के किसानों के दिल्ली कूच करने पर आंदोलन शुरू हुआ तब शायद खुद वहां के किसानों ने सोचा भी नहीं होगा कि यह इतना बड़ा आंदोलन बन जाएगा। किसानों के इस आंदोलन की आग केवल 10 दिन में 10 से ज्यादा राज्यों में फैल गई है और इन सभी राज्यों के अंदर भी आंदोलन शुरू हो गए हैं। किसान केवल अपने राज्य के अंदर ही आंदोलन नहीं कर रहे हैं, बल्कि इन राज्यों से सिंघु बॉर्डर पर भी किसान पहुंच रहे हैं। इस तरह समय बीतता जा रहा है और इस किसान आंदोलन का दायरा बढ़ता जा रहा है जो केवल किसानों की मांग पूरी होने पर ही थमता दिख रहा है।
कृषि कानूनों को रद्द कराने के लिए दिल्ली कूच की हुंकार दस दिन पहले पंजाब के किसानों ने भरी थी और वह दिल्ली के लिए निकल पड़े थे। उस समय आंदोलन में केवल पंजाब का किसान ही दिख रहा था। जब पंजाब के किसान हरियाणा के अंदर आए तो यहां के किसान भी उनके साथ जुड़ गए। किसानों के जत्थे दिल्ली के लिए चलते रहे तो 28 नवंबर को सिंघु बॉर्डर पर रोक लिया गया और किसान वहां धरना देकर बैठ गए। जिसके बाद नए आंदोलन की नींव रखी गई और आंदोलन धीरे-धीरे बढ़ना शुरू हो गया। हरियाणा के किसान भी खूब बढ़ चढ़कर आंदोलन में शामिल होने लगे तो यूपी के किसानों ने भी हुंकार भरकर आंदोलन शुरू कर दिया।
इस आंदोलन को शुरू हुए 10 दिन बीत चुके हैं और इन 10 दिन में यह आंदोलन 10 से ज्यादा राज्यों में फैल गया है। जिससे किसान संगठनों का हौसला बढ़ता जा रहा है और आंदोलन बढ़ने से सरकार की परेशानी बढ़ती जा रही है। यह आंदोलन पंजाब व हरियाणा के अलावा यूपी, उत्तराखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, झारखंड, बिहार तक पहुंचा है और किसान प्रतिनिधि दावा करते है कि यह आंदोलन अन्य राज्यों के अंदर भी शुरू हो गया है। क्योंकि वहां के किसान संगठनों के प्रतिनिधि उनसे संपर्क करके आंदोलन पर चर्चा भी कर रहे है। इस तरह किसानों की मांगों को पूरा नहीं किया गया तो आंदोलन बढ़ता ही जाएगा।
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सिंघु बॉर्डर पर भी पहुंचे 10 से ज्यादा राज्यों के किसान
कृषि कानूनों को रद्द कराने के लिए किसान केवल अपने ही राज्यों में आंदोलन नहीं कर रहे हैं। बल्कि किसान लगातार सिंघु बॉर्डर पर भी पहुंच रहे हैं। वह धरना के बीच में अपने राज्यों में होने वाले आंदोलन व उसकी आगे की रणनीति की चर्चा भी करते हैं। किसानों को अपने यहां के आंदोलन के बारे में बताकर उनका हौसला भी बढ़ा रहे हैं। सिंघु बॉर्डर पर राजस्थान, महाराष्ट्र, ओडिशा, मध्य प्रदेश, केरल, कर्नाटक, बिहार, झारखंड के किसान पहुंचे हैं। जिन्होंने हर तरह से आंदोलन में साथ रहने की बात कही है और कृषि कानून रद्द कराने के बाद ही पीछे हटने का फैसला लिया है।
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कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब से आंदोलन शुरू हुआ था तो उस समय यह सोचकर नहीं चले थे कि यह आंदोलन इतना बड़ा हो जाएगा। आंदोलन हर दिन बढ़ता जा रहा है और यह देशभर में शुरू हो गया है। हर किसी की एक ही मांग है कि कृषि कानूनों को रद्द किया जाए। कृषि कानूनों को रद्द कराने के लिए डटे हुए है और आंदोलन को इस तरह ही बढ़ाते रहेंगे। सरकार को किसानों की मांग पूरी करनी ही होगी। मांग पूरी होने के बाद ही आंदोलन खत्म किया जाएगा, यह सरकार को साफ कह दिया गया है। सरकार चाहे गोली मारे या लाठी मारे, हम मांग पूरी हुए बिना नहीं हटेंगे।
- हरेंद्र सिंह लखोवाल, महासचिव भाकियू पंजाब
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किसानों का यह आंदोलन पंजाब से शुरू होकर सिंघु बॉर्डर तक आया और किसान यहां धरना देकर बैठ गए तो हमारे यहां उड़ीसा में आंदोलन खड़ा किया गया। हमारे कुछ किसान यहां धरने पर आए हुए हैं, क्योंकि सभी किसान इतनी दूर से नहीं आ सकते हैं। लेकिन ओडिशा में एक बड़ा आंदोलन नव निर्माण किसान संगठन ने किसानों के साथ मिलकर राज्य के अंदर खड़ा किया है, जिसमें विरोध प्रदर्शन हो रहा है और पुतले भी फूंके गए हैं। यह आंदोलन अब तभी खत्म होगा, जब कृषि कानूनों को रद्द कर दिया जाएगा। उससे कम किसान कुछ भी मानने को तैयार नहीं है।
- अक्षय कुमार, अध्यक्ष नव निर्माण किसान संगठन उड़ीसा
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कृषि कानूनों के विरोध में शुरू हुआ यह आंदोलन केवल एक ही तरह से सरकार खत्म करा सकती है और वह इन कृषि कानूनों को रद्द कराकर ही कराया जा सकता है। किसानों को इससे कम कुछ मंजूर नहीं है और यह सरकार को साफ तौर पर बता दिया गया है। इसलिए सरकार जल्द से जल्द किसानों की मांग को मान लेना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा तो आंदोलन चलता रहेगा। अब यह किसी एक राज्य का आंदोलन नहीं है, बल्कि पूरे देश के किसानों का आंदोलन हो गया है।
- योगेंद्र यादव, संस्थापक जय किसान आंदोलन