सोनीपत। साहित्यकार एवं लेखक डॉ. संतराम देशवाल को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान दिया जाएगा। वह हरियाणा के साहित्य में अग्रणी हस्तियों में शुमार करते हैं। उनकी साहित्यिक यात्रा और योगदान ने देशभर में उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाई है। उनकी पत्नी डॉ.राजकला देशवाल भी उत्कृष्ट लेखकों में शामिल हैं।
डॉ. संतराम देशवाल ने साहित्य के विभिन्न विधाओं में 30 से अधिक पुस्तक लिखी हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘लोक-आलोक’, ‘अनकहे दर्द’, ‘हंस बोलिए मेरे राम’, और ‘इक्कीसवीं सदी के ललित निबंध’ जैसे लेख शामिल हैं। उनकी पुस्तक ‘लोक-आलोक’ और कविता संग्रह ‘अनकहे दर्द’ को साहित्य अकादमी द्वारा सर्वश्रेष्ठ पुस्तक के रूप में पुरस्कृत किया जा चुका है।
कॉल आई तो लगा कोई प्रैंक कर रहा
डॉ. संतराम देशवाल ने बताया कि पद्मश्री के लिए उन्हें बिना बताए उनके बेटे व पुत्रवधू ने आवेदन किया था। ऐसे में उन्हें यह अवाॅर्ड मिलने को लेकर कोई उम्मीद नहीं थी। दोपहर को उन्हें दिल्ली में मंत्रालय से कॉल आई और बताया कि उन्हें पद्मश्री अवाॅर्ड के लिए चयनित किया गया है। उन्हें लगा कि उन्हें कोई प्रैंक (मजाक) कर रहा है, लेकिन बाद में उनके बेटे की कॉल आई तो पता लगा।
हरियाणवी लोक साहित्य को दिया सदैव बढ़ावा
डॉ. संतराम देशवाल ने सदैव हरियाणवी लोक साहित्य व संस्कृति को बढ़ावा दिया। इतना ही नहीं उनकी जीवनशैली में भी यह स्पष्ट रूप से दिखाता है। हरियाणा के लोक साहित्य पर आधारित कई शोध पूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। ‘हरियाणा के लोक साहित्य के नवरत्न’ और ‘हरियाणवी लोक साहित्य: कड्डन विधा’ प्रमुख हैं। इसके अलावा, उन्होंने हरियाणवी नव गजल और ललित निबंध लेखन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
इन पुरस्कारों से नवाजे जा चुके
डॉ. संतराम देशवाल को साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में महाकवि सूरदास आजीवन साहित्य साधना सम्मान, जनकवि मेहर सिंह पुरस्कार, बाल मुकुंद गुप्त साहित्य सम्मान, सर्वोत्तम पत्रकारिता सम्मान, सर्वोत्तम शिक्षक सम्मान, सोनीपत रत्न सम्मान, हिंदी सहस्त्राब्दी सम्मान, काव्य कलश सम्मान आदि सम्मान उन्हें मिल चुके हैं। उनकी साहित्यिक प्रतिभा को विभिन्न विश्वविद्यालयों और संस्थानों ने भी सराहा है। हरियाणा साहित्य अकादमी उन्हें कई बार सम्मानित कर चुकी है। कई साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया है और साहित्य अकादमी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘हरिगंधा’ के अतिथि संपादक भी रह चुके हैं। वह अपनी उपलब्धियों का श्रेय अपने गुरुजनों, बुजुर्गों, पूर्वजों, और जीवनसंगिनी डॉ. राजकला देशवाल को देते हैं।