सोनीपत। मौत और मौत में भी फर्क होता है क्या? एक सामान्य आदमी कहेगा नहीं। लेकिन, राजनीति शायद यह फर्क करती है। तभी तो अनुसूचित जाति के एक किशोर की मौत पर मातम मनाने जहां सत्ता और विपक्ष में होड़ लग जाती है, सीबीआई जांच की मांग उठती है, परिवार वालों को राहत देकर जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास होता है, वहीं दरिंदगी का शिकार बनाकर मार डाली गई 14 साल की किशोरी के परिवार को न्याय दिलाने, उनको मदद देने की बात तो दूर, ढाढ़स बंधाने तक की परवाह कोई नहीं करता। लोग सवाल कर रहे हैं, क्या यह फर्क इसलिए कि जान गंवाने वाली बेटी दूसरे प्रदेश की है, उसकी मौत से वोटों पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता और ये कि दलित बेटे की मौत पर खामोशी वोटों का समीकरण बिगाड़ सकती है।
दोनों घटनाओं की तिथियों में बहुत अंतर नहीं है, लेकिन राजनीति अपराध की गंभीरता कहां देखती है। दलित किशोर के मामले में तो परिवार वालों के लिए लाखों रुपये की घोषणा कर दी जाती है, लेकिन उस परिवार को घटना के तीन दिन बाद मात्र दो लाख रुपये देने का ऐलान किया जाता है, जिसकी 14 साल की बेटी को कुछ दरिंदों ने घंटाें नोंचा-खसोटा और फिर मारकर गड्ढे में दबा दिया। लोग सवाल कर रहे हैं क्या यह फर्क इसलिए कि किशोरी पिछड़ी जाति से संबंध रखती है और वह भी प्रवासी परिवार से। या इसलिए कि नेताओं ने मान लिया है कि अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के इस मामले में बोलने को न तो मीडिया अधिक तवज्जो देगा और न ही इनके वोट मिलेंगे। दोनों परिवारों का दर्द बराबर है। दोनों ने अपनों को खोया है, लेकिन क्या यह दर्द नेता अपने वोट वाले तराजू में तौल कर बयानों का मोलभाव कर रहे हैं। जो भी हो, लेकिन ये दोनों ही घटनाएं आम जनता के लिए सबक का काम कर रही हैं। मृतक किशोरी का परिवार भी इस दर्द को छिपा नहीं पाता कि एक लड़के की मौत पर हजारों लोग आंसू बहाने आते हैं, लेकिन उनकी मासूम बिटिया की मौत पर कोई झूठे आंसू भी बहाने नहीं आया।