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कोरोना में न गायकी के सुर और न सांग व नाटक मंचन, कलाकारों का हाल हुआ बेहाल

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सोनीपत। कोरोना संक्रमण के दौर में संगीत से लेकर भजन-कीर्तन और सांग तक के कार्यक्रमों पर रोक है। न गायकी के सुर और न सांग व नाटक का मंचन हो रहा है। न साज है और न आवाज, मंच पर होने वाली रौनक गायब हो चुकी है। सवा साल से गीत-संगीत व कलाकारी से जुड़े लोगों की बदहाली का दौर जारी है। हर जगह कलाकारों की एक जैसी कहानी है।
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लोक कलाकार कह रहे हैं कि कोरोना संक्रमण ने तो उनकी कमर तोड़कर रख दी है। हालत ऐसी हो गई है कि कलाकारों का रोजी रोटी चलना मुश्किल है। संगीत से ही उन्हें रुतबा, सम्मान और शोहरत मिली है। ऐसे में वह किसी से मदद भी नहीं मांग पा रहे हैं। वर्ष 2020 में लॉकडाउन की शुरुआत के साथ ही उनकी मुसीबत बढ़ने लगी थी। पिछला साल तो जैसे-तैसे कट गया था। लोक कलाकार सोच रहे थे कि अब स्थितियां सुधर जाएंगी, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर ने तो उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। सूर्यकवि पंडित लख्मीचंद के पौत्र वरिष्ठ कलाकार व सांगी पंडित विष्णु दत्त शर्मा तक के पास काम नहीं हैं। वह भी खेती कर परिवार का गुजर-बसर कर रहे हैं। कोरोना के मुश्किल समय में इन तक कोई सरकारी योजना नहीं पहुंची। यह किसी योजना के दायरे में आते ही नहीं। ऐसे में कई कलाकारों के सामने फाके करने की नौबत आ गई है।
कलाकारों के लिए तो भुखमरी के हुए हालात
कला और संस्कृति को बढ़ावा देने की बातें तो बहुत होती है, लेकिन कोरोना काल ने हकीकत को उजागर कर दिया। जो कलाकार सरकारी कार्य या व्यवसाय से जुड़े हैं उनके लिए तो मुश्किल कम हैं, लेकिन जो सिर्फ सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर ही आश्रित रहते थे उनके सामने भुखमरी जैसे हालात हैं। मेरे साथ काम करने वाले कई कलाकारों को मजदूरी करनी पड़ रही है। कलाकार 10-15 साल की कड़ी साधना के बाद अपना मुकाम हासिल करता है। ऐसे में सरकार को इस कठिन दौर में उन्हें आर्थिक मदद देनी चाहिए। जिससे वह मां सरस्वती की आराधना करते हुए परिवार का गुजर-बसर कर सके।
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- विष्णु दत्त शर्मा, वरिष्ठ कलाकार व सूर्यकवि पंडित लख्मीचंद के पौत्र।
किसी ने नहीं की कलाकारों की सुनवाई
कोरोना काल में कलाकारों की कोई सुध लेने वाला नहीं हैं। धार्मिक आयोजनों में भजन कीर्तन से लेकर गीत संगीत के कार्यक्रम करके हम लोगों का परिवार पलता है, लेकिन पिछले साल से ही सब कुछ बंद पड़ा है। हमारी सुनने वाला कोई नहीं है। पहले महीने में औसतन 30-40 हजार तक की कमाई हो जाती थी, जिससे मां सरस्वती की साधना अच्छे से करते थे, लेकिन अब तो करीब सवा साल से घर बैठे है। आपात काल के लिए जो कुछ पूंजी एकत्रित की थी वह भी खत्म हो चुकी। सरकार को कलाकारों की मदद करनी चाहिए।
- अन्नू मोरवाल, गायिका एवं कलाकार
अब तो परिवार चलाना हो गया है मुश्किल
कोरोना संक्रमण काल में कलाकारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। कलाकारों के सामने जीवनयापन का कोई दूसरा साधन नहीं है। ऐसे में परिवार चलाना भी मुश्किल हो गया है। समय रहते सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो कलाकारों की स्थिति ज्यादा गंभीर हो जाएंगी। कार्यक्रम बंद होने के साथ ही स्कूलों में जाकर बच्चों को संगीत की शिक्षा देने वाले भी बेरोजगार हो गए हैं। स्कूल बंद होने से उनकी सेवाएं भी नहीं ली जा रही।
- सूरज कुमार, लोक कलाकार व ट्यूटर
गीत-संगीत के कार्यक्रम नहीं होने से घर में बैठे हैं कलाकार, गुजारा करना मुश्किल
कोरोना के संक्रमण की शुरुआत से ही गीत-संगीत के कार्यक्रम बंद हैं। ऐसे में सवा साल से घर बैठे हैं। पिछले साल से ही सभी आयोजन निरस्त चल रहे हैं। सीजन में प्रतिदिन कुछ न कुछ कमा लेते थे, जिससे परिवार का गुजारा हो जाता था, लेकिन इस वक्त दो जून की रोटी को परिवार मोहताज हो चुका है। अब तो ऐसे हालात हैं कि स्थिति बयान नहीं की जा सकती है। बड़े कलाकार तो फिर भी यू-ट्यूब व अन्य माध्यम से कमा लेते हैं, लेकिन छोटे कलाकार पूरी तरह बर्बाद होने के कगार पर हैं। सरकार को ऐसे कलाकारों का रजिस्ट्रेशन कर उन्हें तुरंत आर्थिक मदद देनी चाहिए।
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- रायकमल, गायक एवं कलाकार।
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