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Sonipat News: नहाय-खाय के साथ छठ महापर्व शुरू, खरना पूजा के साथ व्रतियों का होगा 36 घंटे का उपवास

Wed, 06 Nov 2024 02:09 AM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
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सोनीपत। नहाय-खाय के साथ मंगलवार को छठ महापर्व की शुरुआत हो गई। बुधवार को खरना पूजा के साथ ही व्रतियों का 36 घंटे का उपवास शुरू होगा। सूर्योपासना, आस्था एवं पवित्रता का त्योहार चार दिन तक मनाया जाता है। मंगलवार को श्रद्धालुओं ने सब्जी मंडी में छठ पर्व के सामान की खरीदारी की। दूसरी ओर, सूर्य को अर्घ्य देने के लिए शहर में कबीरपुर व बाबा काॅलोनी में घाट बनकर तैयार हैं, जबकि गांव रोहट स्थित पश्चिमी यमुना नहर के पास और यमुना में भी घाट की व्यवस्था की गई है। छठ महापर्व को लेकर पूर्वांचल समाज के परिवारों में विशेष उत्साह है।
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मंगलवार सुबह घर की सफाई करने के बाद छठ व्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत की। भोजन के रूप में विशेष रूप से घिया-दाल, चावल, चने की दाल बनाई गई। पं. रामकृष्ण पाठक ने बताया कि छठ पूजा मुख्य रूप से सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का पर्व है। इस दौरान 36 घंटे का निर्जला व्रत रखा जाता है। श्रद्धालु डूबते और उगते सूर्य की पूजा करते हैं और अर्घ्य देते हैं। सूर्य देव के आशीर्वाद से व्यक्ति को निरोगी जीवन प्राप्त होता है और उसका घर धन-धान्य से भर जाता है। मान्यता है कि छठी मैया की कृपा से निसंतान दंपतियों को संतान की प्राप्ति होती है।
संतान के सुखी जीवन के लिए भी यह व्रत रखा जाता है। इसके रखने से मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं। उन्होंने बताया कि नहाय-खाय से व्रत की शुरुआत के बाद दूसरे दिन खरना की पूजा होगी। इसके बाद व्रतियों का निर्जला व्रत शुरू होगा। तीसरे दिन व्रती डूबते हुए सूर्य देव को अर्घ्य देंगी। माना जाता है कि डूबते सूर्य की लाल किरणें अर्घ्य के जल से छनकर तन-मन और बुद्धि को तेज कर देती हैं। फिर अगले दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही व्रत का पारण होगा।
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छठी मैया की पूजा का महत्व

शास्त्रों के अनुसार छठ देवी भगवान ब्रह्माजी की मानस पुत्री और सूर्यदेव की बहन हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ब्रह्माजी ने सृष्टि रचने के लिए स्वयं को दो भागों में बांट दिया, इसमें दाहिने भाग में पुरुष और बाएं भाग में प्रकृति का रूप सामने आया। सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने स्वयं को छह भागों में विभाजित किया। इनके छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृ देवी या देवसेना के रूप में जाना जाता है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इनका एक नाम षष्ठी है, जिसे छठी मैया के नाम से जाना जाता है। शिशु के जन्म के छठे दिन भी इन्हीं की पूजा की जाती है। इनकी उपासना करने से बच्चे को स्वास्थ्य, सफलता और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। नवरात्रि पर षष्ठी तिथि को इनकी पूजा की जाती है।
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