अब बनेगी सस्ती और आंखों को अनुकूल, तेज रोशनी की एलईडी
-मुरथल विश्वविद्यालय में भौतिकी विभाग की शोधार्थी ने किया व्हाइट एलईडी मैटीरियल पर शोध
अमर उजाला ब्यूरो
सोनीपत। समय व प्रकृति की मांग को देखते हुए मुरथल यूनिवर्सिटी के भौतिकी विभाग की शोधार्थी पिंकी नरवाल ने भविष्य की व्हाइट एलईडी मैटीरियल पर शोध किया है। इस तरह की एलईडी लाइट आंखों को हानि नहीं पहुंचाती, साथ ही जेब का भी पूरा ख्याल रखेगी। यह पर्यावरण के अनुकूल होगी। कम खर्च में बेहतरीन सुविधा देती प्राकृतिक लाइट को शोधार्थी पिंकी ने शोध पत्र के रूप में प्रकाशित किया है।
पिंकी नरवाल ने अपने शोध में पाया कि हम फास्फोरस मैटीरियल के स्थान पर डिस्प्रोसियम डोप्ड बिस्मथ बोरेट ग्लासी मैटीरियल का प्रयोग कर सकते हैं, क्योंकि इसमें पोलिमर मैटीरियल बेस की जरूरत नहीं होती है। जिससे एलईडी लंबे समय तक तो चलेंगी ही, साथ ही साथ ऊर्जा भी कम लगेगी और एलईडी की रोशनी नहीं बिखरेगी व आंखों पर दबाव भी नहीं पड़ेगा। डिस्प्रोसियम डोप्ड बिस्मथ बोरेट ग्लासी मैटीरियल लेड फ्री है, जो कि पर्यावरण के अनुकूल है।
इस मैटीरियल को बनाने के लिए किसी बड़ी मशीन की आवश्यक्ता नहीं है। इसको कम लागत में बनाया जा सकता है। बिजली पर्यावरण मानव की दृश्य तीक्ष्णता, व्यवहार व काम करने की इच्छा शक्ति को प्रभावित करता है। डिस्पोसियम डोप्ड बिस्मथ बोरेट ग्लासी मैटीरियल का प्रयोग करने पर एलईडी सफेद प्रकाश देगी। जिससे विद्यार्थियों को रात के समय अध्ययन करने में सहायता मिलेगी। पिंकी नरवाल के शोध पत्र सिरेमिक इंटरनेशनल व जर्नल ऑफ नॉन क्रिस्टेलाइन सोलिड्स में प्रकाशित हुए हैं।
उर्जा संरक्षण में मिलेगी मदद
भौतिकी विभागाध्यक्ष प्रो. सतीश खासा ने कहा कि हम अभी इस तरह के मैटीरियल बनाने के प्रारंभिक दौर में हैं। जैसे ही हम उपयुक्त कलर इमीशन और सीसीटी (कोरिलेटिड कलर टैंपरेचर) को प्राप्त कर लेंगे तो इस तरह के ग्लासी मैटीरियल से बनी एलईडी पारंपरिक एलईडी के बाजार में क्रांति ले आएगी। वीसी प्रो. राजेंद्र कुमार अनायत ने कहा कि किसी भी देश के विकास में ऊर्जा का अहम योगदान होता है। अगर हम कम लागत में लंबे समय तक बेहतरीन प्रकाश देने वाली एलईडी बनाने में सफल हो जाते हैं तो ऊर्जा के संरक्षण करने में मदद मिलेगी।