भरत का भ्रातृप्रेम समाज के लिए अनुकरणीय : स्वामी रत्नेश महाराज
अमर उजला
सोनीपत। दि महाराजा अग्रसेन समाज कल्याण समिति व श्री ज्योतिषपीठ की ओर से सेक्टर-14 स्थित अग्रसेन भवन में दिव्य श्री रामकथा ज्ञान महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। महायज्ञ के समापन पर मंगलवार को प्रवचन करते हुए जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रत्नेश महाराज ने बताया सच्चा धर्म हमें प्रेम सिखाता है। प्रेम की व्याख्या हमें भरत चरित्र में दिखाई देती है। प्रेम हमें स्वार्थहीन होना सिखाता है। निस्वार्थता की अग्नि में तपकर ही प्रेम अपने उज्जवल रूप में अभिव्यक्त होता है। सब जगह स्वार्थ शून्य व्यक्ति ही संसार में परिवर्तन ला सकता है।
स्वामी रत्नेश महाराज ने कहा कि भरत अवध का सिंहासन ग्रहण करें, धर्म उसका समर्थन कर रहा था। पर भरत के अंत: करण ने इसका समर्थन नहीं किया। उन्होंने धर्म के स्थूल रूप को नहीं देखा, उसके सारतत्व को ग्रहण किया। भरत ने धर्म के स्थान पर परमधर्म को स्वीकार किया। जिस रामराज्य को महाराज दशरथ अयोध्या में लाना चाह रहे थे उसके शिल्पकार भरत बने। क्योंकि रामराज्य की आधारशिला प्रेम है। भरत का भ्रातृप्रेम समाज के लिए अनुकरणीय है। भ्रातृप्रेम पारिवारिक सामाजिक धर्म है। महायज्ञ के समापन के अवसर पर 59 बच्चों को जर्सी वितरित की, भंडारे के साथ कथा का समापन किया गया। इस मंच के माध्यम से सभी भक्तों को आने वाली 9 दिसंबर को ज्यादा से ज्यादा संख्या में दिल्ली रामलीला मैदान में पहुंचने की अपील की। इस दौरान आरके कुच्छल, अनिल गुप्ता, महताब खत्री, रामदिया गुप्ता, विपुल कुच्छल, सुभाष महता, यक्ष कुच्छल आदि श्रद्धालु मौजूद रहे।