सिरसा। जब समूचा भारतवर्ष होली के रंगों में सराबोर होता है, तब बिश्नोई समाज इस दिन को भक्त प्रह्लाद की भक्ति और सत्य की विजय के रूप में मनाता है। बिश्नोई समाज होलिका दहन नहीं करता, बल्कि इसके विपरीत, अगली सुबह रामा-सामा के अवसर पर हवन कर पाहल ग्रहण करता है और तब भोजन करता है।
यह परंपरा न केवल आध्यात्मिक रूप से विशिष्ट है, बल्कि प्रकृति और धर्म रक्षा का एक जीवंत उदाहरण भी है। यह वचन गांव बुर्जभंगू की श्री हरि गोशाला में आयोजित कथा में कथावाचक गो ऋषि स्वामी राजेद्रानंद महाराज ने कहे। उन्होंने बताया कि बिश्नोई समाज केवल एक संप्रदाय नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा और पर्यावरण रक्षा का जीवंत संदेश है। हमारी परंपराएं भगवान जम्भेश्वर जी महाराज की शिक्षाओं से प्रेरित हैं, जिन्होंने हमें बताया कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि जीवों, प्रकृति और सत्य की रक्षा में है। स्वामी जी ने बताया कि भगवान जम्भेश्वर जी की शबदवाणी में भक्त प्रह्लाद का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। सबदवाणी में कहा गया है कि प्रह्लाद ने सत्य और धर्म की राह नहीं छोड़ी, भले ही उन्हें अग्नि में जलाने का प्रयास किया गया।
रामा-सामा बिश्नोई समाज की आध्यात्मिक परंपरा
होलिका दहन न करने के स्थान पर बिश्नोई समाज रामा-सामा की पावन परंपरा का पालन करता है। स्वामी जी ने बताया कि होलिका दहन की रात बिश्नोई समाज में कोई भी भोजन नहीं करता। इसके बजाय, अगले दिन प्रात: हवन यज्ञ किया जाता है, जिसमें वैदिक मंत्रों के साथ अग्निहोत्र कर पर्यावरण की शुद्धि की जाती है। इस हवन के उपरांत पाहल (पवित्र चरणामृत) ग्रहण किया जाता है और तब भोजन किया जाता है।