सिरसा। कहा जाता है कि शिक्षक ऐसा दीपक है, जो खुद जलकर दूसरों को रास्ता दिखाता है। अकसर शिक्षक की छवि सख्त रवैये के रूप में पहचानी जाती है, लेकिन एक हिंदी के अध्यापक ऐसे भी हैं जिन्होंने इस धारणा को बदल डाला। नए प्रयोग किए और बच्चों पर जोर-जबरदस्ती के बजाय उनका दोस्त, पारिवारिक सदस्य की तरह पढ़ाया। पुस्तकें न होने पर खुद नोट्स तैयार किए और रुचिकर बनाने के लिए उन्हें डिजिटल रूप दिया। आवाज के साथ अध्याय को कहानी के रूप में बदला और प्रोजेक्टर के माध्यम से पढ़ाया। परिणाम ये रहा कि कई विद्यार्थियों ने तो हिंदी विषय में 95 नंबर तक भी हासिल किए। हम बात कर रहे हैं हिंदी अध्यापक सुरेश कुमार की। हाल ही में हुए तबादला के तहत सुरेश कुमार शहर के राजकीय मॉडल संस्कृति स्कूल में आए हैं।
आम तौर पर माना जाता है कि पाठ्य पुस्तकें रुचिकर नहीं होती। इसमें जो अध्याय होते हैं, उन्हें पढ़ने पर विद्यार्थी कम रुचि दिखाते हैं। ऐसे में हिंदी के अध्यापक सुरेश कुमार ने नया तरीका निकाला। उन्होंने मोबाइल की सहायता से पूरे अध्याय को स्कैन किया। इसकी पीपीटी तैयार की और अपनी आवाज की रिकार्डिंग भी करते हुए पूरे अध्याय को कहानी के रूप में प्रस्तुत कर दिया। इस पीपीटी को कक्षा में प्रोजेक्टर की सहायता से स्क्रीन पर चलाया। इससे लाभ ये हुआ कि विद्यार्थी पुस्तक पढ़ने के बजाय प्रोजेक्टर पर ज्यादा रुचि लेते हुए पढ़े। कहानी के रूप में अध्याय पेश करने से उन्हें आसानी से याद भी हो गया। इसके बेहतर परिणाम सामने आए। शिक्षक सुरेश कुमार बताते हैं कि शेरपुरा स्थित राजकीय विद्यालय में उनकी कक्षा का हिंदी का परिणाम 100 फीसदी रहा। इतना ही नहीं शाह सतनाम जी स्कूल में कार्यरत रहने के दौरान एक विद्यार्थी के हिंदी में 96 नंबर तक भी आए।
ऐसे आया दिमाग में आइडिया, दूर हुई विद्यार्थियों की बहाने बाजी
राजकीय स्कूलों में विद्यार्थियों को फ्री पुस्तकें विभाग की ओर से भेजी जाती है, लेकिन कई बार विभाग देरी से पुस्तकें पहुंचता है। ऐसे में समस्या होती है कि विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती है। कई बार विद्यार्थी भी बहानेबाजी करते हैं कि पुस्तक घर रह गई हैं। ऐसे में शिक्षक को नया आइडिया आया। उन्होंने प्रोजेक्टर के माध्यम से पढ़ाना शुरू किया। इससे इन समस्याओं का समाधान भी हुआ और परिणाम भी बेहतर आए।
लॉकडाउन में काम आया होम वर्क
शिक्षक होम वर्क करते आते थे, यानी घर से तैयारी कर पीपीटी तैयार करके लेकर आते थे। ये काम लॉकडाउन में काम आया। स्कूल बंद हो गए तो शिक्षक सुरेश कुमार ने बच्चों को ग्रुप में पीपीटी भेज दी। इससे पढ़ाई आसान हो गई और सभी अध्याय आसानी से समझ में आने लगे।
दोस्ताना व्यवहार का हुआ विरोध, चुनौतियों का भी करना पड़ा सामना
सुरेश कुमार ने नया प्रयोग किया और बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करते हुए पढ़ाई का माहौल बनाया। ऐसे में ये दूसरे शिक्षकों और कई ग्रामीणों को भी रास नहीं आया। इसका कई बार विरोध भी हुआ। कई बार पंचायतें भी हुई, लेकिन जो झूठे आरोप लगे, उनमें कोई सच्चाई नहीं थी। ऐसे में बाद सराहना भी हुई। सुरेश कुमार बताते हैं कि उनकी ड्यूटी जिस भी स्कूल में रही, वहां उन्होंने मिड-डे मील का काम भी कामकाज देखा। इसके तहत उन्होंने हर माह बच्चों का जन्मदिन भी बेहतर तरीके से मनवाए।