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मां की शिक्षा से बेटा बना डॉक्टर और बेटी बनी आईएफएस

Sat, 13 May 2017 10:47 PM IST
अमर उजाला/ब्यूराो/सिरसा
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कहते हैं शिक्षा का प्रारंभिक दौर घर से शुरू होता है और घर में मां से बढ़कर इस कार्य को कोई पूरा नहीं कर सकता। मां अपनी संतान को बुलंदियों तक पहुंचाने का सपना देखाभाल के दौरान ही संजो लेती है। बच्चे यदि मां के सपने को पूरा कर दें तो मां को और कुछ नहीं चाहिए। मां ने कड़ी मेहनत कर अपने बच्चों को मंजिल तक पहुंचा कर अपनी मातृत्व दायित्व को निभाया है।
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जी हां हम बात कर रहे हैं सी ब्लॉक निवासी सुमन मेहता की जिन्हाेंने अपने बेटे को डॉक्टर और बेटी को आईएफएस (भारतीय विदेश सेवाएं) बनाने में अहम भूमिका निभाई। बच्चों को मंजिल तक पहुंचाने के लिए जीतोड़ मेहनत की और घर की जिम्मेवारियाें को भी साथ-साथ बखूबी निभाया।
अमर उजाला से बातचीत के दौरान सुमन मेहता ने बताया कि शादी के बाद उन्होंने डीएवी स्कूल में टीचर की नौकरी शुरू की। इसके बाद वर्ष 1990 में नौकरी छोड़ दी और बेटी के जन्म के बाद उसकी देखाभाल शुरू कर दी। बचपन से ही बेटी (याशिका मेहता) को ऐसी शिक्षा देनी शुरू की कि उसने आईएएस में सफलता हासिल कर ली और आईएफएस को चुना। याशिका ने बीटेक की पढ़ाई में गोल्ड मेडल हासिल किया। इसी प्रकार बेटा निखिल मेहता भी मां द्वारा दिखाए रास्तों पर चला और डॉक्टर बन गया। निखिल फिलहाल एम्स में एमडी कर रहा है और एमबीबीएस के दौरान रिसर्च में तीन बार गोल्ड मेडल हासिल किए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भी निखिल को सम्मानित किया गया।
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बच्चों की सफलता की कहानी बताते हुए सुमन मेहता ने बताया कि जब दोनों बच्चे छोटे थे तो उनको वह स्वयं ही कोचिंग देने लगीं। जब बच्चों ने आठवीं कक्षा में प्रवेश लिया तो मैने फिर से डीएवी स्कूल में शिक्षण के कार्य को संभाल लिया। सुमन बताती हैं कि जब बच्चे छोटे थे तो तभी ठान लिया था कि इनकी परवरिश में कोई कमी नहीं छोड़ूंगी। पढ़ाई के साथ-साथ उनका हर प्रकार से मार्ग दर्शन किया। घर का काम और नौकरी भी साथ करती रही पर बच्चों को 12वीं कक्षा तक एक दिन भी स्कूल से लेट नहीं होने दिया।
हर दिन उनका होमवर्क चेक करना मेरी आदत में सुमार हो गया था। इस दौरान काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा पर पति देवेंद्र मेहता और परिवार के सभी सदस्यों की ओर से जो सहयोग मिला उससे मेरा हौसला कभी टूटा नहीं। दोनों बच्चे जब बाहर पढ़ने लगे तो हर दिन मुझसे फोन पर बात करते रहे और यदि कोई समस्या होती तो उसके निदान के बारे में भी पूछ लेते। अब भी यह सिलसिला जारी है। सुमन कहती हैं कि अब बेटी यूरोप में नौकरी करने जाएगी तो मुझे खुशी होगी कि मेरी बेटी विदेश में देश का प्रतिनिधित्व करेगी। मां के लिए इससे बढ़कर और खुशी की क्या बात हो सकती है। बेटा डॉक्टर बनकर स्वास्थ्य सेवाएं देगा। सुमन मेहता ने बताया कि अपने बच्चों की देखभाल के लिए भले ही उसे कड़ी मेहनत करनी पड़ी हो पर अपने स्कूल में अपनी कक्षा के बच्चों की पढ़ाई पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ने दिया क्योंकि वे भी तो मेरे बच्चों जैसे हैं।
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