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12 साल बाद भी मरीजों को सुविधा की आस

Sun, 10 Jul 2016 12:49 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला सिरसा
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अस्‍पताल - फोटो : Bureau
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स्वास्थ्य सेवाओं के घोर अभाव का दंश झेल रहे ऐलनाबाद वासियों को 27 जनवरी 2004 को प्रदेश सरकार ने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के रूप में तोहफा दिया था। लोगों को उम्मीद जगी थी कि अब उन्हें सरकार द्वारा प्रदत्त स्वास्थ्य सेवाओं का बेहतर लाभ प्राप्त होगा। परंतु सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के उद्घाटन के कुछ समय बाद ही उम्मीदें धराशाई हो गईं। उद्घाटन के 12 वर्षों बाद भी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। आलम यह है कि इस स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सकीय एवं गैर चिकित्सकीय पदों को मिलाकर ढाई दर्जन से अधिक पद खाली पड़े हैं। अब सिर्फ दो चिकित्सकों, दो फार्मासिस्ट, सात स्टाफ नर्सों, तीन चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों व एक अनुबंध के आधार पर रखी महिला सफाई कर्मी के सहारे इस 30 बिस्तर वाले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का कामकाज चल रहा है।
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सबसे बड़ी विडंबना जो इस अस्पताल के साथ है, वह यहां के लिए एसएमओ पद का ही सृजित न होना है। अजीब बात है कि उपमंडल मुख्यालय पर स्थित इस 30 बिस्तर वाले अस्पताल के लिए एसएमओ का पद ही सृजित नहीं है, जबकि रानियां व माधोसिंघाना आदि ग्रामीण अस्पतालों में बाकायदा एसएमओ का पद सृजित किया गया है। प्रावधान के अनुसार इस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में 10 चिकित्सा अधिकारी, दो दंत सर्जन, एक दंत मैकेनिक, एक एक्सरे टेक्निशियन, तीन लैब टेक्निशियन, 10 चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, दो क्लर्क, एक डाटा क्लेक्टर, 10 स्टाफ नर्स, दो एएनएम, एक लेडी हेल्थ विजिटर, एक स्वास्थ्य निरीक्षक, पंाच स्वीपर, दो फार्माशिस्ट, एक इलेक्ट्रिशियन, माली आदि पद हैं। उक्त पदों में से कई अभी तक खाली पड़े नियुक्ति की बाट जोह रहे हैं। खाली पड़े सभी पदों पर नियुक्ति हो तब जाकर इस अस्पताल को सही मायनों में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कहा जा सकता है। इस अस्पताल के उद्घाटन के समय अर्थात 12 वर्ष पूर्व यहां करीब चार लाख रुपये की लागत से एक्सरे मशीन स्थापित की गई थी लेकिन एक्सरे टेकिभनशियन के न होने के कारण इस कमरे को पिछले 12 वर्षों से ही ताला लगा हुआ है और यह एक्सरे मशीन धूल फांक रही है।

अस्पताल में दंत रोगाें को छोड़कर किसी भी रोग का विशेषज्ञ चिकित्सक भी नहीं है। अस्पताल में मरीजों की तादाद इतनी अधिक है कि 30 बिस्तर के इस अस्पताल में प्रतिदिन लगभग 100 से 150 मरीज उपचार हेतु आते हैं, औसतन दो डिलीवरी रोजाना होती है वहीं 12 से 15 इमरजेंसी मरीज पहुंचते है लेकिन चिकित्सकों के अभाव में मरीजों की सार-संभाल करे तो कौन, कायदे से एमरजेंसी विभाग में चौबीसों घंटे चिकित्सक की उपलब्धता होनी चाहिए, लेकिन ड्यूटी टाइम के बाद भी इन्हीं चिकित्सकों को इमरजेंसी केस आने पर अस्पताल की ओर भागना पड़ता है। सिर्फ एक अनुबंधित महिला सफाई कर्मी के कंधों पर सफाई का जिम्मा होने के चलते शौचालय बदबू मारते रहते हैं। अस्पताल में भर्ती रोगियों को अस्पताल प्रशासन की ओर से ही भोजन व रिफ्रेशमेंट देने की व्यवस्था थी वही भी पिछले 6-7 माह से बंद पड़ी है।
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