ओढां। गुलाबी सुंडी ने किसानों के सारे अरमानों पर पानी फेर दिया है। सुंडी के कारण नरमे की औसत पैदावार में 70 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। जहां नरमे की तीन से चार चुगाई होती थी। सुंडी के कारण एक चुगाई करना मुश्किल हो गया है। इतना ही नहीं, चुगाई महंगी होने के कारण किसान को आर्थिक नुकसान होना तय है। बस आस है तो सरकार से गुलाबी सुंडी की गिरदावरी करवाकर मिलने वाले मुआवजे की। संवाद
शुरुआत में फसल बहुत अच्छी थी। मौसम ने भी साथ दिया। इस बार 20 एकड़ में नरमे की बिजाई की थी। अच्छी फसल देखकर उम्मीद थी कि इस बार औसतन 12 से 15 क्विंटल प्रति एकड़ नरमा तो हो ही जाएगा। लेकिन गुलाबी सुंडी के बाद प्रति एकड़ 3 से 4 क्विंटल नरमा होना भी मुश्किल है। चुगाई व लागत पूरी हो जाए तो गनीमत रहेगी। 50 हजार के हिसाब से जमीन ठेके पर ली थी। वहीं, कीटनाशकों पर करीब 2 लाख रुपये का खर्च आ गया। बुआई, बिजाई, मजदूरी, तेल खर्च व खुद की मेहनत अलग से। नरमे की क्वालिटी भी नहीं है, जिसके चलते बेचने में भी दिक्कत आएगी।
- सुल्तान देमीवाल, किसान (नुहियांवाली)।
खेतों में नरमे की फसल खत्म हो चुकी है। एक वो समय था जब घरों की छतों पर टिंडे खिलने के लिए डालते थे। फिर उसे पूरी सर्दी चुगते रहते थे। अब तो पौधों पर भी टिंडे नहीं हैं। इस बार 12 एकड़ में नरमे की बिजाई की थी। कीटनाशक व अन्य खर्च का आकलन करें तो एक एकड़ पर करीब 15 हजार रुपये का खर्च आया। प्रति एकड़ मात्र 3 क्विंटल नरमे की औसत पड़ेगी। ऐसे में लागत खर्च भी पूरा नहीं होगा।
- सुभाष बिजारणियां, किसान (नुहियांवाली)।
तैयार फसल में इस बार गुलाबी सुंडी ने दोहरी चोट लगाई है। किसान कैसे कर्ज उतारेगा और कैसे अपने परिवार का पालन-पोषण करेगा। विगत वर्ष भी फसल अच्छी नहीं थी। इस बार 10 एकड़ में नरमे की बिजाई की थी। सोचा था कि अच्छी फसल होगी, जिससे कृषि यंत्र खरीदेंगे और कुछ लेनदेन भी हो जाएगा। गुलाबी सुंडी की रोकथाम के लिए कीटनाशकों पर करीब सवा लाख रुपये खर्च कर दिए, लेकिन सुंडी फिर भी नहीं मरी। अब तो 10 एकड़ में 5 क्विंटल नरमा हो जाए तो अच्छा है। कृषि यंत्र खरीदना तो दूर पहले वाले बेचने तक की नौबत आ गई है।
- रणवीर जाखड़, किसान (गांव बनवाला)।
इस बार 10 एकड़ में नरमे की बिजाई की थी। करीब एक लाख रुपये के कीटनाशकों का छिड़काव कर दिया। बुआई, बिजाई व मजदूरी का खर्च अलग से। शुरुआती दौर में उम्मीद थी कि 30 से 35 मन प्रति एकड़ नरमा हो जाएगा। लेकिन अब फसल देखकर सारे समीकरण ही बिगड़ गए। इस समय स्थिति ये है कि एक एकड़ में दो क्विंटल नरमा हो जाए तो अच्छा है। प्रवासी मजदूर आए थे, लेकिन वे कमजोर फसल देखकर वापस चले गए। अब मजदूरों को मजबूरी में 400 रुपये दिहाड़ी देकर चुगाई करवाई जा रही है। मजदूर अपनी जगह सही हैं, लेकिन किसान क्या करे। खेतों में फसलें खत्म हो गई हैं। हम सरकार से यही मांग करते हैं कि स्पेशल गिरदावरी करवाकर उचित मुआवजा दे।
- कौर सिंह कुंडर, किसान (ओढां)।
सरकार विभिन्न चीजों पर बड़ा पैसा खर्च कर रही है। लेकिन किसानों की दयनीय हालत की ओर कोई ध्यान नहीं दे रही। बाहरी देशों में नरमे की बीटी 4 की किस्म चल रही है। वहां पर कोई बीमारी नहीं। बीमारी नहीं होगी तो ही फसल अच्छी होगी। अगर सरकार हमारे देश में भी ये किस्म लेकर आती है तो किसान खुशहाल होगा। खेतों में झुलसी खड़ी फसल नहीं किसानों के अरमान हैं। इस बार मैंने 12 एकड़ में नरमे की बिजाई की थी। करीब डेढ़ लाख रुपये कीटनाशकों पर खर्च हो गए। बचत तो दूर खर्चे भी पूरे नहीं हो रहे।
-जग्गा सिंह, किसान (घुंकावाली)।
मैं एक छोटा खेतिहर किसान हूं। इस बार ढ़ाई एकड़ में नरमे की बिजाई की थी। पूरी फसल में गुलाबी सुंडी की भरमार है। टिंडों में खिलाव नहीं हो रहा। उम्मीद तो थी कि ढ़ाई एकड़ में 35-40 क्विंटल नरमा हो जाएगा और फसल बेचकर लेनदेन कर लेंगे और कुछ घर खर्च भी निकल जाएगा। लेकिन अब कुछ नहीं होगा। समझ नहीं आ रहा कि रबी की बिजाई कैसे करें। खेतों में हर तरफ झुलसी हुई फसलें खड़ी हैं। सरकार से मांग है कि स्पेशल गिरदावरी करवाकर किसानों की मदद करे।
सुभाष बडज़ाती, किसान (नुहियांवाली)।
इस बार मौसम अनुकूल रहने के चलते फसल अच्छी थी लेकिन गुलाबी सुंडी का भयंकर प्रकोप रहा। नरमे की फसल बेहद खराब है। सरकार द्वारा एक अक्तूबर से क्षतिपूर्ति पोर्टल शुरू किया जा रहा है। जिसमें किसान अपना पंजीकरण करवाकर नुकसान का ब्योरा दर्ज कर सकते हैं।
- रमेश सहु, सहायक तकनीक प्रबंधक (कृषि विभाग खंड ओढां)।