अक्तूबर माह में जो धान 1100 रुपये प्रति क्विंटल बिका था, अब वह तीन हजार रुपये के पास पहुंच गया है। जिन किसानों ने रेट के इंतजार में धान नहीं बेचा था, उनके चेहरे पर तो खुशी है, लेकिन जो किसान पहले बेच चुके हैं, वे अब अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहे हैं। धान की आवक पर नजर डालें तो इससे साफ है कि अधिकतर किसान इससे पूर्व सस्ते दामों पर ही बेच चुके हैं। पिछले एक सप्ताह से धान के रेटों में आ रहे उछाल से किसानों को आर्थिक लाभ मिलना तय माना जा रहा है।
जिले में अब तक 25 लाख 23 हजार क्विंटल धान की आवक हो चुकी है, जबकि गत वर्ष इन दिनों तक 17 लाख 69 हजार क्विंटल आवक हुई थी। धान के रेट एक सप्ताह से बढ़ने शुरू हुए हैं। इससे पूर्व न्यूनतम समर्थन मूल्य पर और उससे पहले 900 से 11 सौ रुपये प्रति क्विंटल धान व्यापारियों द्वारा खरीदा गया था। इस बार केवल धान की फसल पर ही किसानों का दारोमदार था, क्योंकि इसके अलावा सभी फसलें नष्ट हो गई थीं। जिन किसानों ने धान की खेती की थी, उन्हें उस रेट को लेकर काफी नुकसान उठाना पड़ रहा था। हालांकि जो रेट अब हैं, इससे काफी हद तक किसानों को लाभ मिलेगा।
धान की विभिन्न किस्मों के रेट
इन दिनों पीबी-1 के 2360 रुपये प्रति क्विंटल, 1401 के 2629 रुपये प्रति क्विंटल, 1121 के 3000 रुपये प्रति क्विंटल, लाजवाब 1970 रुपये प्रति क्विंटल और 1509 किस्म के 1650 रुपये तक के रेट हो गए हैं।
अब तक हुई आवक
अब हुई आवक के अनुसार 6,53,557 क्विंटल ग्रेड-ए, 87,643 क्विंटल 1509, 17,19,286 क्विंटल मूच्छल, 62,817 क्विंटल बासमती धान की आवक हो चुकी है। आवक के आंकड़े से यह भी स्पष्ट हो रहा है कि अधिकतर किसानों ने सस्ते दामों में ही धान बेच दिए।
यह बोले किसान
किसान छिंद्रपाल ने बताया कि उन्होंने अक्तूबर माह में 1100 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से धान बेच दिया था। इस प्रकार रेट नहीं होने चाहिए, क्योंकि इससे किसानों को नुकसान होता है और व्यापारियों को लाभ होता है। किसान बंसीलाल का कहना है कि मैने नवंबर के प्रथम सप्ताह में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान बेच दिया और अब रेट बढ़ गए, अब ऐसा क्या हो गया है कि रेट बढे़ हैं। इससे साफ जाहिर है कि व्यापारी बड़े स्तर पर किसानों की लूट का खेल खेलते हैं। किसान विक्रम सिंह ने बताया कि किसानों की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर हो गई है कि किसान फसल को बेचने के लिए इंतजार नहीं कर सकते। व्यापारियों को इस बात का अंदेशा होता है और वे पीक समय पर माहौल मंदी का बना देते हैं। जो किसान छह माह तक फसल को तैयार करता है उसे उतनी कमाई नहीं होती, जितनी व्यापारी को फसल की खरीद के 15 दिन में हो जाती है।
वर्जन
फसलों के रेट बढ़ना अच्छी बात है, पर कई-कई गुणा रेट कम हो जाने से किसानों को पूंजीपतियों का खेल समझ में नहीं आता, जिससे किसानों को नुकसान हो रहा है।
ओमप्रकाश सिंवर, किसान नेता