सिरसा। स्वच्छ भारत मिशन के बावजूद आज भी सरकारी संस्थानों में सफाई की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। सिरसा के राजकीय महिला महाविद्यालय की हालत भी इससे अलग नहीं है। यहां करीब दो हजार से अधिक छात्राएं पढ़ाई करती हैं, लेकिन कॉलेज परिसर के शौचालयों की स्थिति तो और भी दयनीय है। टॉयलेट में गंदगी है।
कॉलेज प्रशासन के अनुसार, पूरे परिसर की सफाई के लिए सिर्फ दो स्वीपर नियुक्त हैं। इतने बड़े कॉलेज परिसर और हजारों छात्राओं के बीच केवल दो सफाई कर्मचारियों से साफ-सफाई की उम्मीद करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। वहीं स्वीपरों से बात की गई तो उन्होने कहा कि वे रोज सुबह लगभग 4 से 5 घंटे तक मेहनत करके पूरे शौचालयों की सफाई करते हैं, लेकिन कुछ ही घंटों बाद हालात फिर वैसे ही हो जाते हैं।
स्वीपर ने बताया सुबह-सुबह जब कॉलेज खुलता है तो हम सब जगह सफाई कर देते हैं, लेकिन दोपहर तक टॉयलेट की हालत फिर खराब हो जाती है। कई छात्राएं फ्लश तक नहीं करतीं, कूड़ेदान होने के बावजूद इस्तेमाल किए गए सेनेटरी पैड बाहर ही फेंक देती हैं। ऐसे में सफाई बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।
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जिम्मेदारी केवल कर्मचारियों की नहीं, छात्राएं स्वयं भी रखें ध्यान
कॉलेज प्रशासन का कहना है कि सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं, लेकिन छात्राओं में स्वच्छता के प्रति जागरूकता की कमी सबसे बड़ी समस्या है। कई बार नोटिस जारी किए गए, पोस्टर लगाए गए और स्टाफ मीटिंग में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई, लेकिन स्थायी सुधार नहीं हो पाया। कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल विक्रमजीत सिंह ने बताया हमने कई बार छात्राओं को समझाया कि स्वच्छता का जिम्मा केवल सफाई कर्मचारियों का नहीं है। यह हम सबकी जिम्मेदारी है। अफसोस की बात यह है कि कई छात्राएं लापरवाही दिखाती हैं। अगर प्रत्येक छात्रा अपनी जिम्मेदारी समझे तो कॉलेज का माहौल स्वच्छ और सुखद बनाया जा सकता है।
सैनिटरी हाइजीन में भी लापरवाही
महिला महाविद्यालय होने के बावजूद यहां सैनिटरी हाइजीन के लिए भी स्थिति चिंताजनक है। कई टॉयलेट्स में सेनेटरी पैड डिस्पोजल मशीनें नहीं है। डस्टबिन है, लेकिन छात्राएं इस्तेमाल किए गए पैड टॉयलेट के कोनों में या फिर बाहर ही फेंक देती हैं। इससे न केवल गंदगी फैलती है बल्कि संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है।
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सुधार के लिए क्या हो सकते हैं उपाय
विशेषज्ञों का मानना है कि महिला कॉलेजों में सफाई व्यवस्था सुधारने के लिए दोहरी रणनीति अपनाने की जरूरत है। एक तरफ सफाई कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जाए और नियमित निगरानी रखी जाए, वहीं दूसरी ओर छात्राओं को स्वच्छता के प्रति व्यावहारिक रूप से जागरूक किया जाए। कॉलेज में स्वच्छता क्लब बनाकर छात्राओं को जिम्मेदारी दी जा सकती है कि वे अपने समूहों में साफ-सफाई का ध्यान रखें। प्रत्येक विभाग में एक स्वच्छता मॉनिटर नियुक्त किया जा सकता है जो दैनिक रिपोर्ट दे। इसके साथ ही, सैनिटरी वेस्ट के लिए बायो-डिग्रेडेबल डस्टबिन और डिस्पोजल मशीनें लगाई जाएं और पानी और फ्लश सिस्टम की मरम्मत तत्काल की जाए।
कॉलेज की इस स्थिति के लिए विकल्प ढूंढ़ा जा रहा है। शौचालयों को साफ करने के लिए सामान मंगवाया गया है। जल्द ही समाधान हो जाएगा। - विक्रमजीत सिंह, वाइस प्रिंसिपल, राजकीय महिला महाविद्यालय, सिरसा।