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साहित्य के ‘द्रोण’ दिखा रहे युवाओं को नई राह

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 प्रो. रूप देवगुण युवा लेखकों के लिए किसी द्रोणाचार्य से कम नहीं हैं। उनकी अब तक दर्जनों किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो युवाओं के लिए मार्गदर्शक हैं। वहीं, उन पर आठ विद्यार्थी एमफिल और एक पीएचडी कर चुके हैं। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के एमए हिंदी के पाठ्यक्रम में उनकी पांच कविताओं को शामिल किया गया है।
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इसके अलावा वे समय-समय पर काव्य गोष्ठियों का आयोजन कर युवा कवियों को मंच प्रदान कर उनकी प्रतिभा को निखारने का काम कर रहे हैं। तीन दर्जन से अधिक पुस्तकें  लिख चुके प्रो. देवगुण अनेक पुरस्कार हासिल कर चुके हैं और लघु कथा में उनकी राष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान है।


    प्रो. रूप देवगुण का जन्म एक नवंबर 1943 में पाकिस्तान के लाहौर स्थित नरवड़ में हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा नोहरिया बाजार सिरसा से शुरू हुई और बाद में एमए हिंदी दोआबा कालेज जालंधर से की। बीएड और एमए पंजाबी मोगा से की और पीएचडी विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ भागपुर से हुई।
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 उन्होंने नेशनल कालेज सिरसा में हिंदी प्राध्यापक के रूप में नौकरी शुरू की और 34 साल तक अध्यापन कार्य किया। बचपन से ही साहित्य के प्रति रुचि रही। वर्ष 1962 में कालेज की पत्रिका घग्घर में पहली कहानी प्रकाशित हुई।1964 में पहली बार किसी समाचार पत्र में कहानी का प्रकाशन हुआ।

 1981 में उनका प्रथम कविता संग्रह मिलन को दूर से देखो प्रकाशित हुआ। उन्होंने कविता, गजल, लघु कविता, कहानी, लघु कथा, निबंध, पंजाबी कहानी, समीक्षा, बाल साहित्य, संस्मरण आदि विधाओं में लिखा।


प्रो. देवगुण के अब तक तेरह कविता संग्रह, मिलन को दूर से देखो, गुलमोहर मेरे आंगन में, प्रश्न उठता है मेरे भीतर, गली का आदमी, एक बात पूछूं, जब तुम चुप रहती हो, आप सब हैं, मेरे आसपास, पहाड़ के बादल अभिनय करते हैं, तुम झूठ मत बोला करो, रास्ता तय करते करते, दुनियाभर की गिलहरियां, खिड़की खोलकर देखो, नदी की तैरती सी आवाज, छह कहानी संग्रह मैं+तुम=हम, छतें बिन मुंडेर की, कब सोता है यह शहर, अंजान हाथ की इबारत, चार लघु कथा संग्रह दूसरा सच, यह मत पूछो, मेरी प्रिय कहानियां, तो दिशु ऐसे कहता, सात संपादित संकलन चिंगारियां, आवाजें, हरियाणा का लघु कथा संसार, हिंदी की सशक्त लघु कथाएं, शिक्षा जगत की लघु कथाएं,  एक गजल संग्रह ये कभी सोचा न था आदि प्रकाशित हो चुके हैं।


प्रो. देवगुण ने लिखने के साथ-साथ नवोदित साहित्यकाराें को प्रोत्साहन दिया। हर माह काव्य गोष्ठी और साहित्यकारों के साथ रूबरू कार्यक्रम करवाते हैं। आप बहुत याद आते हो नाम से साहित्य कार्यक्रम संचालित किया जाता है। 70 वर्षीय प्रो. देवगुण को और हरियाणा ही नहीं दूसरे राज्यों में अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं।

 हरियाणा साहित्य अकादमी के सहयोग से उनकी कई पुस्तकाें का प्रकाशन हो चुका है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के एमए हिंदी के पाठ्यक्रम में उनकी पांच कविताओं को शामिल किया गया है। उनका कहना है कि जो भी मन में ख्याल आए उसे कागज पर उतार देना चाहिए।

 बाद में उस ख्याल को मात्राआें की सीमाओं में बांधकर कविता और गजल का रूप दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति के अंदर लेखक, कवि और शायर छिपा हुआ है बस उसे पहचानने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जो भी लिखा जाए वह समाज को दिशा देने वाला हो। उन्होंने बताया कि उनका लेखन कार्य आखिरी सांस तक जारी रहेगा।
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फोटो विवरण:27एसआईआरपी1:प्रो.रूपदेवगुण।
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