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यूरोप में भी जगमगाते कृष्ण के बनाए दीये

Sat, 18 Oct 2014 12:20 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, सिरसा
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दीवाली को लेकर भले ही बाजार पर चीन से उत्पादित सामान का दबदबा हो पर मिट्टी के दीयों के बिना पूजन अधूरा ही माना जाता है।
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ठीक वैसे ही जैसे सोने के घडे़ का पानी कंठ को तृप्त नहीं करता। मिट्टी को सोने में बदलने की कला अब संकट में है।

सिरसा में बने मिट्टी के दीये देश ही नहीं विदेश में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। पर इस बार मिट्टी की कमी, जलावन, महंगाई ने कुम्हारों के सपनों पर पानी फेर दिया है।

महंगाई के कारण दीयेे का लागत खर्च भी बढ़ा है। वहीं बाजार में चायनीज बिजली चलित लड़ियां, मोमबत्ती व अन्य फैंसी सजावट का सामान भी लोगों के आकर्षण का सबब बना हुआ है।
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ऐसे में दीये बनाने का कार्य घाटे का सौदा साबित हो रहा है। बावजूद इसके कुछ कारीगर इस कला को जीवित रखे हुए हैं। शिवपुरी कालोनी निवासी कृष्ण कुमार प्रजापत देश में ही नहीं विदेश में अपनी माटी से पहचान बना चुके हैं।

इनके बनाए दीपक, मिट्टी के झूमर, मिट्टी के गैस सिलेंडर वाले गुल्लक, श्रीगणेश और लक्ष्मी के मूर्तियां देश भर में ही नहीं यूरोप के प्रमुख देशों में अपना जादू कायम किए हैं।

इन देशों में जर्मनी, फ्रांस और मलेशिया, इंग्लैंड में इनकी खासी धूम है। कृष्ण कुमार ने बताया कि पिछली दीवाली पर्व के खत्म होते ही विदेशों से दीपक को आर्डर मिलने शुरू हो गए थे,

लेकिन इस बार आर्डर तो मिले लेकिन महंगाई के चलते उसने सारे आर्डर पूरे नहीं किए जा सके। कृष्ण कुमार का कहना है कि सबसे ज्यादा परेशानी मिट्टी के लिए आ रही है,

मिट्टी की एक ट्राली का दाम दो हजार रुपये लगते हैं, जिसके कारण वह महंगी पड़ती है। इसके अलावा दीपकों को पकाने में प्रयुक्त होने वाला ईंधन भी पहले से काफी महंगा हो गया है।

ऐसे में दीपकों का लागत खर्च पहले से काफी बढ़ गया है। विदेशों में पहले जिस दाम में दीपक भेजे जाते हैं वो ही दाम इस बार मिल रहे हैं, जबकि महंगाई के चलते पहले से खर्च बढ़ गया है।

उसने बताया कि एक दीपक पर एक रुपया खर्च आ जाता है और बाजार में एक दीपक एक रुपये से ज्यादा का नहीं बिकता। इससे कोई फायदा नहीं हो रहा।
25 वर्षों से कर रहे कार्य
कृष्ण ने बताया कि वह पिछले 25 सालों से यह धंधा कर रहे हैं, लेकिन इस बार पिछले साल की अपेक्षा काम काफी कम है।

इस बार उन्होंने केवल अस्सी हजार दीपक ही तैयार किए हैं। जो हिसार, फतेहपुर, चुरू, डबवाली, पंजाब में फिरोजपुर, जालंधर, लुधियाना, चंडीगढ़, हांसी, खन्ना, मानसा, हनुमानगढ़, बठिंडा, भिवानी, श्री गंगानगर आदि शहरों में भेजे हैं।

इसी में से कुछ माल सैलानी भी ले गए हैं। उसने बताया कि इस बार दीपावली पर कैंडल स्टेंड, पांच गणेश वाला दीपक,

लक्ष्मी-श्रीगणेश का मंदिर, स्टेंड वाले दीपक, शंख, फूल और पान पत्ते की आकृति वाले दीपक, दीपक वाली थाली, पंचमुखी के अलावा हटड़ी तैयार की है, जिसमें 21, 31 और 51 दीपक बनाएं गए हैं।
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कृष्ण ने बताया कि मिट्टी के दीये काफी महंगे होने के कारण इनका महत्व धीरे धीरे कम होता जा रहा है। इसलिए गुजारे के लिए और मार्केट में बने रहने के लिए उसने अब मिट्टी के सिलेंडर वाली गुल्लक, झूमर, मिट्टी के कैंपर आदि बनाने का काम जारी है।

मिट्टी के दीये का प्रचलन कम होता जा रहा है। लोग चायनीज लड़ियां, रंगीन मोमबत्ती की ओर ज्यादा आकर्षिक हो रहे हैं।

लोग दीपकों की खरीदारी केवल पूजन के लिए ही करते हैं। क्योंकि इन्हें जलाने के लिए सरसों का तेल चाहिए जो 90 रुपये किलो में मिलता है।

शास्त्रों के अनुसार मान्यता तो मिट्टी के दीपक की ही है लेकिन मिट्टी के दीये महंगे होने के कारण लोग धीरे-धीरे इनसे किनारा कर रहे हैं।
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