कथा करते कथावाचक शास्त्री जयदेव दाधीच
बडागुढ़ा। गांव कर्मगढ़ के राधा-कृष्ण मंदिर में चल रही राम कथा के छठे दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने शिरकत कर कथा सुनी। कथा के दौरान कथावाचक शास्त्री जयदेव दाधीच ने श्रद्धालुओं को श्रीराम के वनवास, महाराज दशरथ के प्राण त्यागने तथा भरत मिलाप का प्रसंग सुनाया।कथावाचक ने सुनाया कि अयोध्या में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियां चल रहीं थी। इसी बीच दासी मंथरा के बहकावे में आकर रानी कैकेयी ने महाराज दशरथ को पूर्व में दिए गए वचनों का स्मरण करवाते हुए श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास व अपने पुत्र भरत के लिए राजगद्दी मांग ली।अपने वचनों में बंधे महाराज दशरथ ने कैकेयी को अन्य और कुछ मांगने के लिए कहा, लेकिन वे अपनी हठ पर अडिग रहीं।
अपने पिता के वचनों की लाज रखते हुए श्रीराम वन में जाने हेतु तैयार हो गए। श्रीराम के वनवास की खबर जैसे ही नगर में फैली तो सभी नगरवासी दुखी हो जाते हैं। वहीं देवी सीता ने भी पति श्रीराम के साथ वनवास पर जाने का निश्चय किया। वहीं जब लक्ष्मण को यह सूचना मिलती है तो वे क्रोधित हुए, लेकिन श्रीराम के समझाने पर वे शांत हो गए।
लक्ष्मण अपने भैया राम से बहुत स्नेह करते थे इसलिए उन्होंने भी उनके साथ वनवास पर जाने का निश्चय किया। श्रीराम, लक्ष्मण व सीता तीनों अपने माता-पिता का आशीर्वाद लेकर वन हेतु प्रस्थान करते हैं। कथावाचक जयदेव दाधीच ने सुनाया कि श्रीराम के वनवास जाने की पीड़ा को महाराज दशरथ सहन नहीं कर पाए और पुत्र वियोग में तड़प कर प्राण त्याग दिए।
श्रीराम व भरत का हुआ मिलाप
इसके बाद जब भरत और शत्रुघ्न ननिहाल से अयोध्या से लौटे तो उन्हें पूरी बात का पता चला। फिर भरत अपनी माता कैकेयी पर क्रोधित हुए और कहा कि वे अपने भाई श्रीराम की जगह राजगद्दी पर नहीं बैठेंगे। फिर भरत सेना के साथ श्रीराम को ढूंढने वन के लिए निकल जाते हैं। जहां उनका मिलाप श्रीराम से हुआ। भरत ने श्रीराम को वापस अयोध्या चलने के लिए कहा, लेकिन श्रीराम ने अपने पिता के वचन की बात कहते हुए उन्हें वापस लौटा दिया। जाते-जाते भरत ये कहकर श्रीराम की चरण पादुकाएं ले गए कि जब तक वे वनवास से नहीं आ जाते तब तक वे इन चरण पादुकाओं को राजसिंहासन पर विराजमान रखेंगे।