इस बार शहर डबवाली में बेटियों की किलकारी गूंजी है। लिंगानुपात में उम्मीद से बढ़कर सुधार हुआ है। वर्ष 2014 में लिंगानुपात 1000 : 914 था। वर्ष 2015 में बढ़कर यह 1000 : 969 हो गया है।
नगर परिषद के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014 में शहर में डबवाली में कुल 1957 बच्चों ने जन्म लिया था, जिसमें बेटियों की संख्या 935 और बेटों की संख्या 1022 थी। लिंगानुपात 1000 : 914 रहा।
वर्ष 2015 बेटियों के नाम रहा। आंकड़े बताते हैं कि पूरे वर्ष में 1906 बच्चों ने जन्म लिया। जनवरी से दिसंबर तक 938 बेटियां पैदा हुईं, जबकि बेटों की संख्या 968 रही।
55 अंकों की ऊंची छलांग लगाते हुए त्रिवेणी शहर का लिंगानुपात 1000 : 969 हो गया। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान को शहरी क्षेत्र में लिंगानुपात बढ़ने की बड़ी वजह माना जा रहा है।
चूंकि इसी बैनर तले कार्य करते हुए सामाजिक संस्थाओं के साथ शैक्षणिक संस्थाओं ने कार्य किया। विद्यार्थियों ने पूरा साल रैलियों का आयोजन किया। इसके बाद बेटियों के प्रति शहर की सोच बदली। लिंगानुपात में सुधार की मिसाल बने शहर डबवाली में बेटी जन्म पर कुआं पूजन की रसम होने लगी।
खासकर ऐसी बस्तियों में यहां मूलभूत सुविधाएं भी ठीक-ठाक हैं। जागरूकता का ही असर था कि शहर में बेटों की तरह बेटी के जन्म पर भी नामकरण समारोह होने लगे हैं। यही नहीं धीयां दी लोहड़ी मनाई जाने लगी है। शहर डबवाली के लिंगानुपात ने स्वास्थ्य विभाग का सीना चौड़ा कर दिया है।
ग्रामीण आंचल में अभियान को गहरा धक्का
शहर डबवाली का लिंगानुपात बढ़ना अपने-आपमें ही काबिलेतारीफ है। चूंकि शहर पूरी तरह से पंजाब से सटा हुआ है। वर्ष 2015 में स्वास्थ्य विभाग और पुलिस ने मिलकर पंजाब में हो रहे अल्ट्रासाउंड केंद्र का भंडाफोड़ किया था। यहीं नहीं वर्ष की शुरूआत में भी ऐसा ही हुआ था। मोबाइल अल्ट्रासाउंड केंद्र का भंडाफोड़ हुआ।
पंजाब में अल्ट्रासाउंड होने बंद हुए, जिसका व्यापक असर डबवाली शहर पर पड़ा। सफलता को स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की सख्ती कहें या फिर जागरूकता, कुछ हो भी शहर डबवाली वर्ष 2016 में सुखद संदेश लेकर आया है। 22 जनवरी 2016 को बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान की सार्थकता शहर में सिद्ध होती नजर आ रही है।
चूंकि ग्रामीण आंचल में इस अभियान को गहरा धक्का लगा है। वर्ष 2014 में 1000 : 955 का अनुपात 20 कदम पीछे खिसककर 935 आ गया है।
मंच पर बेटियों के लिए मां, अजन्मी बेटी की कहानी, धीयां कोरियोग्राफी के साथ कई नाटक लेकर आए कोरियोग्राफर संजीव शाद ने कहा कि मंच पर कही हुई बातें अगर समाज में सार्थक साबित होती हैं, तो एक कलाकार के लिए इससे बड़ी खुशी नहीं हो सकती। उनके शहर डबवाली का लिंगानुपात सुधरा है, यह गर्व की बात है। वे उम्मीद करते हैं कि वह दिन दूर नहीं, जब बेटा-बेटी में असमानता समाप्त हो जाएगी।
वर्ष 2014 के मुकाबले अधिक बेटियां आना समाजसेवी संस्थाओं की मेहनत का फल है। बस उस दिन का बेसब्री से इंतजार है, जब बेटों के मुकाबले ज्यादा बेटियां जन्म लेंगी। लिंगानुपात सुधार के लिए स्वास्थ्य विभाग डबवाली इसके लिए बधाई का पात्र है।
-मथरा दास चलाना, अध्यक्ष अपने (एनजीओ)
शहर डबवाली का लिंगानुपात बहुत सुधरा है। इसके लिए शहर के सामाजिक, शैक्षणिक संगठन प्रशंसा के काबिल हैं। विभागीय कर्मचारी अपनी ओर से पूरा प्यास कर रहे हैं।
खासकर ऐसे स्थानों पर निगाह बनाई हुई है, जहां लोग बेटे के जन्म की दवा देने का दावा करते हैं। आशा वर्कर और एएनएम लगातार गर्भवती महिलाओं को ट्रेस करती रहती हैं।
-एमके भादू, एसएमओ, डबवाली