कनक, कॉटन और किन्नू के इलाके डबवाली में चार युवाओं ने स्ट्रॉबेरी का उत्पादन शुरू किया है। परंपरागत खेती को छोड़ कुछ नया करने की ठाने युवाओं का प्रयोग सफल रहा है।
इतना ही नहीं स्थानीय बाजार में फसल का भाव नहीं मिला तो युवा मार्केटिंग भी खुद करने लगे हैं। नतीजतन स्ट्राबेरी हाथों-हाथ बिक रही है। डबवाली निवासी संदीप विश्नोई दीपू गांव सकताखेड़ा में अपनी साढ़े बाइस एकड़ पर परंपरागत खेती करते आ रहे थे। धान, गेहूं या फिर कॉटन में लागत मूल्य ज्यादा होने के कारण परंपरा को बदलना चाहते थे। इंडो-इजरायल प्रोजेक्ट के तहत गांव मांगेआना स्थित प्रदेश के एकमात्र फल उत्कृष्टता केंद्र में लगे किसान मेले को देखने के बाद स्ट्रॉबेरी लगाने का आइडिया दिमाग में आया।
मेहनत रंग लाई बिकने लगे हाथोंहाथ
करीब छह सालों से स्ट्रॉबेरी लगा रहे जिला सिरसा के गांव तलवाड़ा खुर्द के किसान गुरमीत सिंह से गुर सीखे। सितंबर 2015 में सोलन (हिमाचल प्रदेश) से स्ट्रॉबेरी की किस्म कांडलर तथा स्वीट चार्ली के पांच हजार पौधे मंगवाकर उन्हें ट्रॉयल के तौर पर एक कनाल भूमि में लगाया। दो माह की कठिन मेहनत के बाद आखिरकार पौधे बड़े होने लगे। दिसंबर माह में पौधों पर फल आ गया। फल मिलने के बाद सवाल था कि आखिरकार इसे बेचेंगे कहां? करीब साढ़े तीन सौ किलोग्राम स्ट्रॉबेरी को जिन्हें 14 डिब्बों में भरकर किसान डबवाली के बाजार में ले आया। फल नया होने के कारण किसी ने भाव तक नहीं दिया। लेकिन 30 रुपये प्रति डिब्बा बेचना पड़ा। युवा किसान का हौसला नहीं गिरा। संदीप ने अपने तीन हिस्सेदारों योगित विश्नोई, अभिषेक कड़वासरा तथा सुशील उर्फ शीलू धायल के साथ मिलकर खुद ही मार्केटिंग शुरू कर दी। एनएच-54 के किनारे स्ट्रॉबेरी की स्टाल लगाकर मार्केट भाव पर ही बेचना शुरू कर दिया। अब 50 रुपये प्रति 250 ग्राम हाथों हाथ बिक रहा है।
हफ्ते भर में मिल जाता है फल
स्ट्रॉबेरी के लिए तापमान कम से कम 15 से 20 डिग्री सेल्सियस के बीच रहना चाहिए। इससे अधिक होने पर पौधे जल जाते हैं। सितंबर 2015 में यही दिक्कत सामने आई थी। पांच हजार पौधों को सुरक्षित रखने के लिए एक कनाल में तीस फव्वारे लगाए गए हैं। इसके बाद तापमान में सुधार होने पर ड्रिप सिस्टम का प्रयोग किया जा रहा है। एक बार फल लेने के बाद हफ्ते भर में पुन: फल मिल जाता है।
छह क्यारियों में रोपित हैं दो किस्में
गांव सकताखेड़ा में छह क्यारी में स्ट्रॉबेरी रोपित की गई है। युवा किसानों ने इजरायली तकनीक का प्रयोग करते हुए एक कनाल भूमि पर छह बेड तैयार किए। मौसमी प्रभाव तथा खर-पतवारों से पौधों को बचाने के लिए उस पर प्लास्टिक की तिरपाल बिछा रखी है। स्ट्रॉबेरी आठ माह तक लगातार चलने वाली फसल है। ट्रायल सफल होने के बाद संदीप विश्नोई आगामी सीजन में इसे एक एकड़ में रोपित करेंगे।
स्ट्रॉबेरी के पौधे हर वर्ष नए लेने पड़ते हैं
सोलन (हिमाचल प्रदेश) से कलम तैयार होकर आती हैं। जिनकी रोपाई की जाती है। ऐसे में एक कलम पर चार रुपये खर्च आते है। युवा किसान स्ट्रॉबेरी की पौध के लिए कृषि विश्वविद्यालय हिसार से संपर्क करेंगे।
हम सब पढ़े-लिखे किसान हैं
धान, कॉटन तथा गेहूं का उत्पादन अब फायदे का सौदा नहीं रहा है। इसीलिए ट्रॉयल बेस पर स्ट्रॉबेरी की बिजाई की। हमने अगले साल एक एकड़ में बिजाई का लक्ष्य रखा है। एक कनाल में करीब 100 क्विंटल स्ट्रॉबेरी का उत्पादन होता है। स्थानीय मार्केट के अतिरिक्त पंजाब तथा राजस्थान में इस फल की डिमांड है। वहां तक पहुंच बनाएंगे।
- संदीप बिश्नोई, किसान