चोपटा (सिरसा)। पैंतालिसा क्षेत्र के किसान परंपरागत खेती के साथ बागवानी को भी बढ़ावा दे रहे हैं। इसके साथ वे अपनी आमदनी को भी बढ़ा रहे हैं। ऐसे ही एक किसान हैं गांव कुम्हारिया निवासी मोहर सिंह न्योल। मोहर सिंह ने 3 वर्ष पहले तीन एकड़ जमीन में अनार का बाग लगाया था। उन पौधों के विकसित होने तक मोहर ने उनके बीच में तरबूज, खीरा, ककड़ी, घीया, टिंडा आदि की खेती कर कमाई का अतिरिक्त जरिया बना लिया।
मोहर सिंह का कहना है कि जब तक अनार से फलों का उत्पादन शुरू नहीं होता, तब तक तरबूज, खीरा, ककड़ी, घीया, टिंडा आदि की खेती कर अच्छे पैसे कमा रहा है। किसान मोहर सिंह का कहना है कि परंपरागत खेती के साथ-साथ बागवानी, फल सब्जियां इत्यादि लगाकर किसान आत्मनिर्भर बन सकते हैं। मोहर सिंह ने बताया कि नहरी पानी की कमी, प्राकृतिक आपदाओं, बीमारियों इत्यादि से परंपरागत खेती में फसलों का उत्पादन कम होने लगा और बचत भी नहीं हो पा रही थी। ऐसे में उसने खेती में आमदनी बढ़ाने का जरिया खोजना शुरू किया तो उसके पुत्र रोहतास ने समाचार पत्रों में बागवानी के बारे पढ़कर तीन एकड़ जमीन में अनार का बाग लगाया।
इसमें अभी तक कम ही फल लगने शुरू हुए हैं, तो उन्होंने अनार के पौधों की कतारों के बीच तीन एकड़ में तरबूज, खीरा, टिंडा, ककड़ी, घीया आदि सब्जियां लगाई। जिससे उसे करीब 3 लाख रुपये की कमाई हुई। उन्होंने बताया कि वे अधिकतर बागवानी खेती में जैविक खाद का प्रयोग करते हैं। जब तक अनार के पौधे पूरी तरह फलदार नहीं हो जाते तब तक वह इनकी कतारों में सब्जियां इत्यादि लगाकर अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें दोहरा लाभ हो रहा है। उन्होंने बताया कि कुम्हारिया, खेड़ी, गुसाईंआना तथा निकटवर्ती गांवों के लोग उनके खेत की सब्जियां काफी पसंद करते हैं। आधुनिक तरीके से खेती करके किसान मोहर सिंह हरियाणा तथा निकटवर्ती राजस्थान के गांव में प्रेरणास्रोत बन गया है। संवाद
पानी की बचत के लिए ड्रिप सिस्टम से करता है सिंचाई
मोहर सिंह न्योल ने बताया कि उन्होंने खेत में डिग्गी बनाई हुई है और जिससे जब जरूरत होती है ड्रिप सिस्टम द्वारा सिंचाई कर पौधों को पानी सीधा जड़ों में दिया जाता है। जिससे एक तो पानी की बचत होती है और पौधों को जरूरत के हिसाब से पानी व खाद इत्यादि मिल जाती है।
मंडी दूर होने से यातायात खर्च होता है ज्यादा
किसान मोहर सिंह का कहना है कि उसके गांव से सिरसा मंडी से दूर पड़ती है। जिससे फलों को वहां ले जाकर बेचने में यातायात खर्च ज्यादा आता है, तथा बचत कम होती है। इसके अलावा नजदीक में कोई वेक्सिंग प्लांट भी नहीं है जिसमें की फलों को संभाल कर रखा जाए। उसका कहना है कि अगर फलों व सब्जियों की मंडी नाथूसरी चोपटा में विकसित हो जाए तो यातायात खर्च कम होने से बचत ज्यादा हो जाएगी तथा एक वेक्सिंग प्लांट लगाया जाए।