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Sirsa News: सीडीएलयू में माता अमृता देवी बिश्नोई के नाम पर होगा भवन

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माता अमृता देवी बिश्नोई। 
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सिरसा। चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नरसी राम बिश्नोई ने विश्वविद्यालय के आईटी डाटा एंड कंप्यूटर सेंटर भवन का नाम ''माता अमृता देवी बिश्नोई भवन'' रखने की घोषणा की है। यह निर्णय विश्वविद्यालय के अधोसंरचनात्मक विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों को संजोने की दिशा में एक प्रेरणादायक पहल के रूप में देखा जा रहा है।
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विश्वविद्यालय के कार्यकारी अभियंता राकेश गोदारा ने बताया कि इससे पूर्व 26 अप्रैल को मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने विश्वविद्यालय के टीचिंग ब्लॉक-5 का नाम ''माता अहिल्याबाई होल्कर भवन'' के रूप में उद्घाटन कर समाज को एक सशक्त संदेश दिया था। हाल ही में आयोजित कोर्ट की बैठक के निर्णयों के अनुसार कंस्ट्रक्शन ब्रांच ने अन्य भवनों के नामकरण के लिए विस्तृत प्रस्ताव उच्चाधिकारियों को प्रेषित किया था।

प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान करते हुए कुलपति प्रो. नरसी राम बिश्नोई ने कहा कि माता अमृता देवी बिश्नोई पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक चेतना की प्रतीक रही हैं। उन्होंने पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए थे।
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प्रो. नरसी राम बिश्नोई ने कहा कि गुरु जम्भेश्वर महाराज ने आज से 540 वर्ष पहले प्रकृति व पर्यावरण संरक्षण की शिक्षाओं देकर समाज के अंदर एक नई अलख जगाई थी। ऐसे महान व्यक्तित्वों के नाम पर भवनों का नामकरण कर हम न केवल उनके योगदान को स्मरण में लाते हैं, बल्कि विद्यार्थियों को उनके आदर्शों से जुड़ने की प्रेरणा भी प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय परिसर को केवल शैक्षणिक गतिविधियों का केंद्र न बनाकर उसे सांस्कृतिक, सामाजिक और नैतिक मूल्यों का संवाहक भी बनाया जा रहा है, जिससे विद्यार्थी समग्र रूप से विकसित हो सकें।



कुलपति प्रो. नरसी राम बिश्नोई ने बताया कि भारत के इतिहास में राजस्थान के जोधपुर जिले के गांव खेजड़ली में घटित एक ऐसी घटना दर्ज है, जिसने न केवल बलिदान की परिभाषा को नया आयाम दिया, बल्कि संगठित पर्यावरण संरक्षण आंदोलन की नींव भी रखी। यह घटना सन 1730 में (लगभग 300 वर्ष पूर्व) जोधपुर के महाराज अभय सिंह के शासनकाल की है।
महाराज ने अपने नये महल के निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ी एकत्र करने का आदेश दिया। स्थानीय बिश्नोई जनों ने इस कार्य का विरोध किया। जब सैनिकों ने उनकी बात नहीं मानी और जबरन वृक्षों की कटाई शुरू की, तब एक साहसी बिश्नोई महिला माता अमृता देवी आगे आईं। उन्होंने खेजड़ी वृक्ष से लिपटकर यह ऐतिहासिक आह्वान किया की यदि सिर कट जाए पर वृक्ष बच जाए, तो यह सौदा सस्ता है।
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इस दौरान माता अमृता देवी के साथ उनकी तीन बेटियों सहित 363 बिश्नोई वीरों और वीरांगनाओं ने खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।
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