कम लागत में अधिक पैदावार के लालच में किसान अंधाधुंध रसायनिक खादों का प्रयोग कर रहा हैं, पर इससे भूमि की उर्वरकता खत्म होती जा रही है।
जिले में प्रतिबंध के बावजूद फसलों के अवशेष जलाए जा रहे हैं, जिससे भूमि के पोषक तत्व और मित्र कीट नष्ट होते जा रहे हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो यह भूमि बंजर हो जाएगी।
ऐसे में वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि मिट्टी पानी की जांच करवाकर ही खाद का प्रयोग करें तभी अच्छी फसल भी मिलेगी और भूमि के पोषक तत्व भी सुरक्षित रहेंगे।
उत्तर भारत में सबसे ज्यादा कपास की पैदा सिरसा जिले में होती है साथ ही गेहूं उत्पादन में देश में सिरसा अव्वल रहा है। कपास की फसल पर पहले काफी कीटनाशकों का प्रयोग होता था पर बीटी कॉटन आने के बाद प्रयोग कम हुआ है।
किसान ज्यादा पैदावार लेने के लालच में कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं, प्रतिबंध के बावजूद फसलों के अवशेष जला रहे हैं जिससे भूमि की उर्वरकता खत्म होती जा रही है।
चार-पांच दशक पहले भूमि बहुत उपजाऊ थी। आज किसान प्राकृतिक खाद जैसे केंचुआ खाद, गोबर खाद का प्रयोग बहुत कम रहा है।
किसान अपनी मर्जी और आढ़तियों की सलाह पर चाहे जरूरत हो या न हो यूरिया, डीएपी, पोटाश, फायरस सल्फेट, मैगनीज सल्फेट, जिंक सल्फेट आदि का प्रयोग कर रहा है।
दूसरी ओर फसली अवशेषों को खेत की खुदाई कर उसे जमीन में दबाने के बजाए जला रहा है। जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाने वाले मित्र कीट भी जलकर मर जाते हैं।
यहीं वजह है कि आज की मिट्टी में नाइट्रोजन व फास्फोरस समाप्त हो चुकी हैं, तो वहीं पोटाश, जिंक, लोहा, मैगनीज भी धीरे-धीरे समाप्ति की कगार पर हैं।
कैसा है सिरसा की मिट्टी का स्वास्थ्य
मिट्टी एवं जल परीक्षण प्रयोगशाला सिरसा ने इस वर्ष जनवरी से लेकर नवंबर माह तक जिले के करीब करीब सभी गांवों के खेतों से मिट्टी के 2062 नमूने लिए थे।
इनकी जांच में सामने आया कि मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा मात्र पंाच प्रतिशत और फास्फोरस की मात्रा केवल दो प्रतिशत ही रह गई है अर्थात मिट्टी 95 प्रतिशत नाइट्रोजन तथा 98 प्रतिशत फास्फोरस जैसी अहम शक्तियों से विहीन हो चुकी हैं।
इसी प्रकार मिट्टी में लोहे की मात्रा 35 से 40 प्रतिशत और पोटाश की मात्रा में 15 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई तो वहीं मैगनीज में भी दो से चार प्रतिशत की कमी आई है।
सल्फर की मात्रा शत प्रतिशत पाई गई। मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी से कोई भी फसल बिना खाद के पैदा ही नहीं हो पा रही है।
फसली अवशेष जलाना घातक
कई किसान अगली फसल की बिजाई की जल्दी में फसलों के अवशेष जलाने में लग जाते हैं। वह जानते हुए भी ऐसा कर भूमि के पोषक तत्वों को खत्म करते जा रहा हैं, फिर पैदावार कम होने का रोना रोते हैं।
जैविक खाद जैसे पशुओं का गोबर, फसली अवशेषों को जमीन में दबाने आदि का काम करना भूल गए हैं। किसान पूरी तरह से मशीनों पर ही आश्रित होकर रह गए हैं।
सिंचाई करने, खाद डालने, खरपतवार काटने, स्प्रे करने तथा फसलों की कटाई आदि का काम भी मशीनों से हो रहे हैं। फसलों के अवशेषों को जलाने से मित्र कीट भी भस्म हो जाते हैं।
स्टाफ की कमी से जूझ रहा है विभाग
जब किसी विभाग में खाली पदों पर नियुक्ति नहीं होती तो काम करने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों पर काम का बोझ बढ़ जाता है। ऐसा ही हाल है मिट्टी एवं पानी परीक्षण प्रयोगशाला का है।
जहां पर पिछले दस सालों से कई अहम पद खाली पड़े हैं। मिट्टी और पानी की जांच का सारा कार्यभार केवल मात्र दो जूनियर साइंटिफिक असिस्टेंट संभाले हुए हैं, जबकि लैब को संभालने वाले लैब अटेंडेंट के चारों पद खाली पड़े हैं।
इनके अतिरिक्त इस कार्यालय में एक मिट्टी जांच अधिकारी, एक स्टेनो, एक क्लर्क तथा एक हेल्पर ही कार्यरत हैं,पर जूनियर साइंटिफिक असिस्टेंट, ट्रेजरर और चौकीदार के पद खाली हैं, जिसकी वजह से इन्हीं कार्यरत कर्मचारियों को सुबह कार्यालय समय के दौरान ताला खोलने से लेकर झाड़ू लगाने, फाइलों के काम निपटाने, लैब में किसी रसायन की कमी की रिपोर्ट बनाने, जांच के लिए आए मिट्टी व पानी के सैंपलों की जांच करने, फाइलें के रखरखाव तक काम देखना होता है।
दोनों जूनियर साइंटिफिक असिस्टेंट ने बताया कि वहां पर सीजन में प्रतिदिन औसतन 20 सैंपल पानी के व लगभग 40 सैंपल मिट्टी की जांच के लिए आते हैं।
फील्ड में कार्यरत एडीओ विभिन्न गांवों से मिट्टी व पानी के सैंपल लेकर कार्यालय पहुंचाते हैं, जहां उन्हें ही उनकी जांच करनी पड़ती है।
विभाग को लिखा है पत्र: गोपीराम सहू
इस संबंध में मिट्टी जांच अधिकारी गोपीराम सहू ने कहा कि लगभग पिछले दस वर्षों से यहां पर खाली पदों पर एक भी कर्मचारी नहीं भेजा गया है। इसके लिए उन्होंने अनेक बार मुख्यालय को पत्र भेजे हैं पर कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
इस कार्यालय में कुल 14 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से केवल छह पद पर ही कर्मचारी लगे हुए हैं और आठ पद खाली पड़े हैं, जिसकी वजह से कार्यरत कर्मचारियों को ही सब काम करना पड़ रहा है।