सिरसा। बिश्नोई सभा सिरसा के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में चल रही साप्ताहिक हरिकथा के चौथे दिन आचार्य स्वामी रामाचार्य महाराज ने गुरु जांभोजी की विभिन्न बाल-लीलाओं व चमत्कारों का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि हमें अपनी संस्कृति, विरासत, इतिहास, परंपराएं हमेशा याद रखनी चाहिए। उन्होंने समाज में व्याप्त बुराइयों का जिक्र किया और छोड़ने का आह्वान किया।
आचार्य स्वामी रामाचार्य महाराज ने कहा कि गुरु जांभोजी मानवीय गुणों से रहित थे। उनके अद्भुत अलौकिक गुणों वाले स्वरूप से हर कोई अचरज में था। गुरु जांभोजी ने लोगों को जीवां न जुगती व मरणोपरांत मुक्ति का रास्ता दिखाना दिखाया। वे सात वर्ष की आयु तक मौन रहे। इस कारण माता-पिता हंसा देवी व लोहट जी चिंतित रहते थे। इसके लिए उन्होंने नागौर के जाने माने भोपा यानी सिद्ध को बुलाया। जांभोजी कर्मकांड व अन्य सभी पाखंडों, अंधविश्वास से दूर रहने की नसीहत देने वाले थे। अत: उन्होंने उस भोपे यानी सिद्ध का भ्रम तोड़ा तथा उसके निमित सबदवाणी का प्रथम शबद का उच्चारण किया। इसमें सतगुरु की विशेषताओं का वर्णन है। स्वामी रामाचार्य ने बताया कि हमें अपनी संस्कृति, विरासत, इतिहास, परंपराएं हमेशा याद रखनी चाहिए। आचार्य ने भोजन, भाषा व भेष को यथास्वरूप बनाए रखने व अपनी पहचान बनाकर रखने का आह्वान किया। जिला सेवक दल प्रधान व मुकाम गोशाला के प्रधान नोखा से पहुंचे सुनील व अन्य जनों को सभा ने सम्मानित किया। बिश्नोई सभा डबवाली प्रतिनिधि मंडल को सभा के प्रधान खेमचंद बैनीवाल, सचिव ओपी बिश्नोई और स्वामी रामाचार्य महाराज ने सम्मानित किया। कथा के अवसर पर उपप्रधान कृष्ण पाल बैनीवाल, सहसचिव जगतपाल कड़वासरा, जगदीश खदाव, कृष्ण लाल बैनीवाल, सुशील बैनीवाल, प्रचार सचिव डाॅ. मनीराम सहारण, हनुमान पटवारी आदि उपस्थित थे।