डबवाली अग्निकांड को अब तक प्रदेश का सबसे भयावह अग्निकांड माना गया है। बीस वर्षों से चला आ रहा अग्निकांड पीड़ितों का संघर्ष अभी तक जारी है। हालांकि मुआवजे की लड़ाई में बेशक सरकार ने अपने कोटे का पैसा देकर पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाने की कोशिश, लेकिन टीस अभी बाकी है। वहीं दूसरी ओर एक निजी संस्थान अब भी अग्निकांड पीड़ितों को कोर्ट की तारीखें भुगतने के लिए मजबूर कर रहा है। डबवाली अदालत से केस हारने के बाद संस्थान ने सेशन कोर्ट में अपील दाखिल की हुई है। जिसकी सुनवाई 24 जनवरी 2016 को होनी है।
क्या हुआ था 23 दिसंबर 1995 को
23 दिसंबर 1995 को चौटाला रोड पर स्थित राजीव मैरिज पैलेस (अब अग्निकांड स्मारक स्थल) में डीएवी स्कूल डबवाली का वार्षिक कार्यक्रम चल रहा था। इसी दौरान 1 बजकर 47 मिनट पर बिजली की शॉर्ट सर्किट से पंडाल के गेट से लगी आग ने देखते ही देखते कुछ ही मिनटों में विकराल रूप धारण कर लिया। हादसे में 442 लोगों की जान गई थी। मृतकों में जिसमें 36 व्यस्क, 258 स्कूली बच्चे और 125 घरेलू महिलाएं व 13 अन्य थे, जबकि 88 लोग घायल हुए थे। बता दें कि कार्यक्रम में करीब दो हजार लोगों ने भाग लिया था। आग से झुलसे लोगों में से 30 ऐसे लोग हैं, जो अपाहिज हो गए। उस समय हालात यह हो गए थे कि मृतक बच्चों, महिलाओं, युवकों तथा पुरुषों के शवों को दफनाने और जलाने के लिए शहर के रामबाग में जगह कम पड़ गई थी। जिसके चलते यहां भी लोगों को खेत-खलिहान में स्थान मिला। वहीं पर शवों को दफनाया गया और अग्नि दी गई। वहीं घायलों को उपचार के लिए अस्पतालों में चिकित्सकों का अभाव हो गया। घायलों को तत्काल इलाज के लिए निजी अस्पतालों के साथ-साथ आस-पास के शहरों में तथा गंभीरों को लुधियाना, चंडीगढ़, रोहतक, दिल्ली के निजी तथा सरकारी अस्पतालों में उपचार के लिए ले जाया गया था।
जारी है मुआवजे की जंग
साल 1996 में न्याय पाने के लिए एसोसिएशन को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में जाना पड़ा। अदालत ने एसोसिएशन की याचिका पर साल 2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश टीपी गर्ग पर आधारित एक सदस्यीय आयोग का गठन करके उन्हें संबंधित पक्षों पर मुआवजा निर्धारित करने का अधिकार दिया। मार्च 2009 को आयोग ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में अपनी रिपोर्ट दी। नवंबर 2009 में हाईकोर्ट ने मुआवजा के संबंध में अपना फैसला सुनाते हुए हरियाणा सरकार को 45 प्रतिशत और डीएवी संस्थान को 55 प्रतिशत मुआवजा राशि पीड़ितों को अदा करने के आदेश दिए। अदालत ने सरकार को 45 प्रतिशत मुआवजा के रूप में 21 करोड़, 26 लाख, 11 हजार 828 रुपये और 30 लाख रुपये ब्याज के रूप में अदा करने के आदेश दिए। जबकि डीएवी संस्थान को 55 प्रतिशत के रूप में 30 करोड़ रुपये की राशि अदा करने के लिए कहा। अग्निकांड पीड़ितों को अदालत द्वारा मुआवजा दिए जाने के आदेश जारी करने के बावजूद जब सरकार ने इसके विरुद्ध अपील करने की ठानी तो अग्निकांड पीड़ितों को संघर्ष करना पड़ा। जिसके चलते सरकार ने तो अपने हाथ पीछे खींच लिए। लेकिन डीएवी मुआवजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चला गया। उच्चतम न्यायालय दिल्ली के न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीएस चौहान तथा न्यायमूर्ति वी. गोपाल गौड़ा की बेंच ने डीएवी की दायर याचिका को खारिज करते हुए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय चंडीगढ़ के नौ नवंबर 2009 के निर्णय को बहाल रखा। मामला उपमंडल न्यायिक दंडाधिकारी डबवाली को सौंप दिया गया। डबवाली अदलात ने अग्निकांड पीड़ितों के पक्ष में फैसला सुना दिया। लेकिन डीएवी संस्थान मामले को आगे जिला अदालत में ले गया। अदालत में मामला अभी भी विचाराधीन है। जिस पर 24 जनवरी 2016 को सुनवाई होगी।
डीएवी संस्थान की ओर चार करोड़ बकाया
अग्निकांड पीड़ित संघ के प्रवक्ता विनोद बांसल ने बताया कि अदालत ने डीएवी संस्थान की ओर जो मुआवजा तय किया था, उसे पूर्ण रूप से भरने में संस्थान हिचकिचा रहा है। अभी तक चार करोड़ 49 लाख रुपये संस्थान की ओर बकाया हैं। जिसका विवाद अदालत में चल रहा है।
क्या रहे अग्निकांड के कारण
-पंडाल में से निकलने के लिए एक ही गेट था।
-खाना व चाय बनाने के उपकरण पंडाल के नजदीक थे।
-बिजली की तारों के जोड़ खुले थे।
-जेनरेटर और बिजली के कनेक्शन लगभग एक साथ थे।
-पंडाल के चारों ओर का घेरा नायलॉन का था।
-इस नायलॉन के कपड़े के साथ-साथ बांस तथा नायलॉन की रस्सी से घेरा बना हुआ था।
-यह नायलॉन के कपड़े भी पेट्रोल से धुले हुए थे, जिसे आग ने जल्द पकड़ लिया।
-पंडाल के ऊपर डाली गई छत पर पॉलिथीन की तरपेल बिछाई हुई थी। पॉलिथीन को आग लग जाने से पॉलिथीन की पिघलती हुई आग की बूंदे जिन दर्शकों पर गिरी, वह आग का शिकार बन गए।
-इस प्रकार से अस्थाई रूप से बना हुआ यह पंडाल लाक्षागृह था।
-मौका पर अग्निश्मक यंत्र भी नहीं थे।
जाने अदालत ने कब, क्या आदेश जारी किए
28 जनवरी 2003 : न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस टीपी गर्ग पर आधारित एक सदस्यीय आयोग का गठन करके मुआवजा राशि तय करने तथा हादसे के लिए लापरवाह संस्थान के बारे में रिपोर्ट देने को कहा।
जून 2003 : 405 मृतकों के परिजनों तथा 88 घायलों ने मुआवजा राशि के लिए अपने आवेदन जस्टिस टीपी गर्ग के समक्ष प्रस्तुत किए।
मार्च 2009 : करीब साढ़े साल साल के कार्यकाल में जस्टिस गर्ग आयोग ने लगभग 1300 लोगों की गवाहियां दर्ज करके रिपोर्ट दाखिल की।
नौ नवंबर 2009 : जस्टिस टीपी गर्ग आयोग की रिपोर्ट पर फैसला सुनाते हुए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने डीएवी संस्थान व हरियाणा सरकार को अग्निकांड पीड़ितों को लगभग 34 करोड़ रुपये की राशि मुआवजा के रूप में देने के आदेश दिए। लेकिन डीएवी निर्णय के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में चला गया।
15 मार्च 2010 : उच्चतम न्यायालय ने प्रथम सुनवाई के दौरान डीएवी संस्थान को आदेश देकर 10 करोड़ रुपये अग्निकांड पीड़ितों में बंटवाए।
आठ जनवरी 2013 : उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई पूरी करते हुए अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया।
23 जनवरी 2013 : उच्चतम न्यायालय दिल्ली के न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीएस चौहान तथा न्यायमूर्ति वी. गोपाल गौड़ा की बैंच ने डीएवी की दायर याचिका को खारिज करते हुए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय चंडीगढ़ के नौ नवंबर 2009 के निर्णय को बहाल रखा।