बूंद-बूंद पानी को तरस रहे शहीद के परिजन
प्यास बुझाने को खरीदना पड़ता है 250 रुपये में पानी का टैंकर
नरेश बेनीवाल
नाथूसरी चोेपटा। सरकार विजय दिवस मनाने का ढिंढोरा पीटती रहती है, लेकिन शहीद के परिजनों को पेयजल के लिए तरसना पड़ता है। यह बात समझ से परे है। सरकार अकसर घोषणाओं पर अमल करना भूल जाती है या फि र आधी अधूरी ही पूरी कर पाती है। सामान्य लोगों के लिए की गई घोषणाओं की तो अनदेखी की जा सकती है, लेकिन यदि मामला देश पर प्राण न्योछावर करने वाले जांबाज सिपाही का हो तो लोगों के मन में पीड़ा होना स्वाभाविक है। कारगिल युद्ध में शहीद हुए खंड के गांव तरकांवाली के जांबाज सिपाही कृष्ण कुमार के परिजन बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं।
शहीद की विधवा संतोष ने बताया कि उसका घर गांव के पास खेत में बनी ढाणी में है वहां पर दस साल से वाटर वर्क्स से पेयजल सप्लाई की लाइन नहीं पहुंची है, जिसके लिए इन्हें पानी खरीदकर पीना पड़ रहा है। संतोष ने बताया कि 250 रुपये से टैंकर पानी का खरीदना पड़ता है तथा पेयजल कनेक्शन के लिए विभाग के कार्यालयों में चक्कर काट कर थक चुकी हैं। उसका कहना है कि यह देश की रक्षा के लिए जान देने वालों का अपमान नहीं तो और क्या है। उनका कहना है कि सरकार ने शहीदी के समय तो कई प्रकार की सहायता दी थी, लेकिन बाद में कोई सुध नहीं ली। उसका कहना है कि अब घर में पीने के पानी का प्रबंध हो जाए तो यह बहुत बड़ी बात होगी।
शहीदी दिवस पर नहीं आता कोई प्रशासनिक अधिकारी
ग्रामीणों का कहना है कि शहादत का दिन प्रशासन हर बार भूल जाता है। गांव के लोग और परिजन अपने स्तर पर ही शहीद को श्रद्धांजलि देते हैं। देशभक्ति का कार्यक्रम आयोजित करते हैं। प्रशासन के अधिकारियों को बुलावा भेजने के बाद भी इस दिन नहीं आते। सरकार ने जो घोषणाएं की थीं वह भी आधी अधूरी ही पूरी हो पाई है। इतना जरूर है कि शहीद के आश्रितों को आर्थिक सहायता दी जा चुकी है, शहीद के भाई को सरकारी नौकरी के अलावा परिजनों को गैस एजेंसी भी दे रखी है। गांव के स्कूल का नामकरण तो शहीद के नाम से हो गया है, लेकिन गांव के पास गुजरने वाली सड़क का नामकरण शहीद के नाम होना बाक ीहै। इसके अलावा शहीद कि प्रतिमा तो शहीद स्मारक में स्थापित कर दी है, लेकिन चाहर दिवारी नहीं निकाली गई है। सिरसा में गोल डिग्गी चौक पर शहीद कृष्ण कुमार की प्रतिमा स्थापित कि गई है।
शहीद कृष्ण कुमार का परिचय
भारतीय सेना में 17वीं जाट रेजिमेंट का बहादुर सिपाही कृष्ण कुमार निवासी गांव तरकांवाली जिला सिरसा कारगिल कि सबसे दुर्गम चोटी टाइगर हिल्स पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए 30 मई 1999 को शहीद हो गया था, लेकिन अपनी बहादुरी के बल पर आठ पाक सैनिकों को मौत कि नींद सुला दिया था। भीषण गोलीबारी और सर्दी के कारण सेना कृष्ण कुमार का पार्थिव शरीर बरामद नहीं कर पाई थी, 45 दिन बाद बर्फ में शहीद का शव भी मिल गया, जिसे लेकर भारतीय सेना के जवान 16 जुलाई को गांव तरकांवाली पहुंची और पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया। शहीद कृष्ण कुमार की सेना में पहली नियुक्ति श्रीनगर में हुई थी अंत तक वहीं रही। सैनिक के साथ-साथ अच्छे वॉलीबॉल खिलाड़ी के रूप में भी याद करते हैं। उसकी शादी 27 मई 1998 को समीप के ही गांव जांडवाला बागड़ में ओमप्रकाश की पुत्री संतोष से हुई थी।
गांव के मुकेश और मनोज का कहना है कि शहीद के घर में पेयजल उपलब्ध करवाना तो सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर देश पर जान न्योछावर करने वालों का यही हाल है तो आम जनता का क्या हाल होगा इसका अंदाजा तो सहज ही लगाया जा सकता है। यदि सरकार इसी प्रकार शहीद ही शहादत की अनदेखी करती रही तो तो यह देश के लिए शहादत देने वालों का घोर अपमान होगा।