रोहतक। सेना में जाकर देश सेवा के जज्बे के साथ ही टिटौली को पहलवानों के गांव के रूप में जाना जाता है। गांव की मिट्टी में पहलवानी ऐसी रची-बसी है कि बड़े खिलाड़ियों की सफलता आज भी नई पीढ़ी को अखाड़ों तक खींच ला रही है। यही कारण है कि सुविधाओं के अभाव के बावजूद यहां से लगातार खिलाड़ी निकलकर गांव का नाम रोशन कर रहे हैं।
ग्रामीणों के बताया कि गांव ने पांच अंतरराष्ट्रीय पहलवान दिए हैं। इृनमें दो बेटियां भी शामिल हैं। कॉमनवेल्थ में स्वर्ण पदक जीतने वाले मनजीत पहलवान और मनीष पहलवान के अलावा एशियन कुश्ती चैंपियनशिप के स्वर्ण पदक विजेता महीपत, जूनियर एशियन चैंपियनशिप की स्वर्ण पदक विजेता अंतिम तथा कांस्य पदक विजेता करुणा कुंडू इसी गांव की पहचान हैं। वहीं अतुल और अमन राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी हैं।
गांव में एक सरकारी स्टेडियम के अलावा तीन अखाड़ों टेका अखाड़ा, मलिसकर जोहड़ के पंचायती अखाड़े और कुंडू भवन अखाड़ा सहित कई स्थानों पर खिलाड़ी नियमित अभ्यास करते हैं। खेल सुविधाओं का अभाव होने के बावजूद यहां के अधिकांश खिलाड़ी अपने दम पर आगे बढ़े हैं। कुश्ती के प्रति बच्चों का विशेष रुझान है और यही वजह है कि अखाड़ों में रोजाना युवा पसीना बहाते नजर आते हैं।
ग्रामीण राम किशन, देवदत्त, ऋषिदेव, आदित्य, नवीन, धर्मेंद्र, संदीप, यज्ञदत्त और अशोक मास्टर बताते हैं कि गांव के बच्चे यहां के नामी पहलवानों और पदक विजेता खिलाड़ियों से प्रेरणा लेकर खेलों में आगे बढ़ रहे हैं।
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ताकत के सूरमाओं की कहानी :
टिटौली की चौपालों और अखाड़ों में आज भी ताकत के सूरमाओं की कहानियां सुनाई जाती हैं। ग्रामीण राम किशन, भगत सिंह, रामचंद्र और सुल्तान बताते हैं कि करीब 70 वर्ष पहले गांव से बैलगाड़ी में एक बारात महम-फरमाना की ओर जा रही थी। रास्ते में एक उग्र गोवंश (खागड़) के खड़े होने के कारण बैलगाड़ियों का आगे बढ़ना मुश्किल हो गया।
बारात में शामिल गांव के नामी पहलवान रतिराम आगे बढ़कर गुस्साए गोवंश को पकड़कर काबू किया और धक्का देते हुए दूर ले जाकर एक गड्ढे में गिरा दिया। बाद में ग्रामीणों के आग्रह पर उसे बाहर निकालकर छोड़ दिया गया। ग्रामीण बताते हैं कि इस घटना के बाद वह गोवंश फिर कभी उग्र रूप में दिखाई नहीं दिया। यह किस्सा आज भी गांव में पहलवानों की ताकत और साहस की मिसाल के रूप में सुनाया जाता है।
कुश्ती के पहले दशकों पहले से ही गांव के युवाओं का रुझान रहा है। मैंने भी बड़ों को कुश्ती करते देखा और पहलवानी शुरू की। गांव में अब अनेक बच्चे अखाड़ों में कुश्ती करते हैं।
- मनजीत, अंतरराष्ट्रीय पहलवान ।
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कृषि प्रधान इस गांव के कई घरों में पहलवान हैं। कुश्ती का यहां बहुत क्रेज है। गांव में पहले से दंगल होते रहे हैं। गांव के तीन अखाड़ों में पहलवान प्रैक्टिस करते हैं।
- नवीन।
पहलवानों का गांव होने पर भी यहां खेल सुविधाओं का अभाव है। यहां अगर खेल सुविधाएं बढ़ाई जानी चाहिए। इससे यहां से मेडलों की संख्या कहीं ज्यादा हो सकती है।
- अशोक।
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बच्चों में शुरू से ही कुश्ती व अन्य खेलों के प्रति रुझान बना हुआ है। गांव के सीनियर पहलवान भी बच्चों को खूब दांव-पेंच सिखाते हैं। इसी कारण यहां कई सारे पहलवान हैं।
- त्रषिदेव कुंडू ।
13-कुंडू भवन अखाड़े में प्रेक्टिस करने पहुंचे पहलवान। संवाद
13-कुंडू भवन अखाड़े में प्रेक्टिस करने पहुंचे पहलवान। संवाद
13-कुंडू भवन अखाड़े में प्रेक्टिस करने पहुंचे पहलवान। संवाद
13-कुंडू भवन अखाड़े में प्रेक्टिस करने पहुंचे पहलवान। संवाद
13-कुंडू भवन अखाड़े में प्रेक्टिस करने पहुंचे पहलवान। संवाद
13-कुंडू भवन अखाड़े में प्रेक्टिस करने पहुंचे पहलवान। संवाद