रोहतक। पीजीआई किडनी रोगियों को नया जीवन दे रहा है। 18 महीने में चिकित्सकों ने 18 सफल किडनी प्रत्यारोपण कर मरीजों को नया जीवन दिया है। इनमें से चार मरीजों में ब्रेन डेड लोगों से मिली किडनी प्रत्यारोपित की गई हैं। यह नाकाफी है। इसकी वजह संस्थान की सूची में किडनी की जरूरत वाले 100 मरीजों के लिए किडनी नहीं मिलना है।
अंगदान के प्रति लोगों में जागरूकता न होना व भ्रांतियों के चलते यह जरूरत पूरी नहीं हो पा रही है। इस काम के लिए संस्थान में बनाई सोटो (स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेल) टीम भी लोगों को अंगदान के लिए प्रेरित नहीं करा पा रही है।
पीजीआई के आंकडों पर नजर डालें तो यहां रोजाना औसतन 20 ब्रेन डेड केस आते हैं। इनमें से दस मरीजों के परिजन भी अंगदान के लिए सहमत होते हैं तो 80 लोगों को नया जीवन मिल सकता है।
चिकित्सकों का कहना है कि एक ब्रेन डेड व्यक्ति आठ लोगों को नया जीवन दे सकता है। अकेले किडनी की जरूरत वाले दस से बीस लोगों को जीवन मिल सकता है। इसके लिए केवल ब्रेन डेड व्यक्ति के परिजनों को प्रेरित करने की जरूरत है।
इस दिशा में प्रयास कम नजर आ रहे हैं। यही वजह रही कि जनवरी से अब तक एक भी ब्रेन डेड व्यक्ति के परिजनों ने अंगदान की सहमति नहीं दी है। इस कारण मरीजों को अंगदान का इंतजार है।
ओपीडी में रोज आ रहे 200 किडनी रोगी, 100 का हो चुका पंजीकरण
बदलती जीवनशैली व खानपान हमारी सेहत बिगाड़ रहा है। दर्द निवारक दवाओं का इस्तेमाल व प्रदूषण का असर किडनी पर पड़ रहा है। इस कारण किडनी मरीजों की संख्या बढ़ रही है।
पीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभाग की ओपीडी में ऐसे रोजाना औसतन 200 मरीज आ रहे हैं। इनमें गंभीर मरीज या किडनी की जरूरत वाले मरीज भी शामिल हैं। सोटो के तहत ऐसे मरीजों का पंजीकरण किया जा रहा है। विभाग में करीब डेढ़ साल पहले किडनी प्रत्यारोपण शुरू हुआ है। यहां अब तक 100 लोगों का पंजीकरण हो चुका है।
- डॉ. अंकुर गोयल, नेफ्रोलॉजिस्ट, पीजीआई।
संस्थान ने किडनी प्रत्यारोपण किए जा रहे हैं। अब तक हुए सफल प्रत्यारोपण से मरीज सामान्य जीवन यापन कर रहे हैं। यहां प्रत्यारोपण संबंधी सभी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हैं। मरीजों को प्राथमिकता से इलाज दिया जा रहा है।
डॉ. एसके सिंघल, निदेशक, पीजीआई।