विजेंद्र कौशिक
रोहतक। लोकसभा चुनाव परिणाम को लेकर प्रत्याशी ही नहीं, बल्कि विधानसभा चुनाव में चारों हलके में टिकट के दावेदार तक बेचैन हैं। कौन दावेदार पार्टी को कितने वोट दिलवा सका, किसके बूथ पर कितनी वोट पार्टी को मिलेंगे। मतदान प्रतिशत क्या रहा, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में ज्यादा तो शहरी क्षेत्र में कम मतदान ने सभी के गणित उलझा दिए हैं। विधानसभा टिकट के लिए बेचैन दावेदारों की कांग्रेस में कम तो भाजपा में संख्या ज्यादा है, क्योंकि रोहतक में कांग्रेस मतलब हुड्डा है, जबकि भाजपा में सर्वोपरि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व है। अब सभी को 4 जून का इंतजार है, जब चुनाव परिणाम ईवीएम से बाहर आएगा।
कलानौर : मनोहर लाल के पूर्व ओएसडी से लेकर पूर्व मेयर तक दावेदार
जिले के चार हलकों में कलानौर अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है, जहां कांग्रेस की दिवंगत महिला विधायक करतार देवी का दबदबा रहा है, जो चार बार विधायक बनीं। 2009 में उनके निधन के बाद कांग्रेस की शकुंतला खटक जीत की हैट्रिक लगा चुकी हैं। 1977 में सीट आरक्षित होने से पहले पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के पिता चौधरी रणबीर सिंह हुड्डा भी 1962 में हलके से विधायक बने थे। इतना ही नहीं, रोहतक शहर से विधायक भारत भूषण बतरा के पिता रामदास बतरा 1968 में जनसंघ और 1972 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने थे। भाजपा ने पिछले तीन चुनाव में रामअवतार वाल्मीकि को टिकट दिया, जो शकुंतला खटक से हर बार हारे। अब तो हलका ही छोड़कर चले गए हैं। ऐसे भाजपा में टिकट के दावेदारों की संख्या बढ़ती जा रही है। पूर्व मेयर रेनू डाबला, पूर्व मुख्यमंत्री के ओएसडी रहे अमरजीत, सूरजमल किलोई, जयहिंद कलिंगा से लेकर सुमिता भाटिया और ओमप्रकाश बागड़ी तक मैदान में हैं।
रोहतक शहर : भाजपा के पूर्व मंत्री तो कांग्रेस के विधायक की साख भी दांव पर
लोकसभा चुनाव में कोसली के साथ अगर किसी हलके में सबसे ज्यादा पसीना अगर कांग्रेस ने बहाया तो वह रोहतक शहर है, जहां 19 हजार वोट से कांग्रेस पिछली बार पिछड़ गई थी। अब की बार कांग्रेस के मुकाबले भाजपा का वोट बैंक सतही तौर पर उतना सक्रिय नजर नहीं आया। हालांकि साइलेंट वोटर की बात भी कही जा रही है। भाजपा व कांग्रेस में किसको हलके से कितनी लीड मिलती है, इसका सीधा असर अक्तूबर में होने वाले विधानसभा चुनाव पर पड़ना तय है। ऐसे में चुनाव परिणाम भाजपा के पूर्व मंत्री व मनोहर लाल के करीबी मनीष ग्रोवर और कांग्रेस के मौजूदा विधायक व भूपेंद्र सिंह हुड्डा के करीबी बीबी बतरा की सियासत पर पड़ेगा। हलके के इतिहास पर नजर डालें तो भाजपा के डॉक्टर मंगलसेन ने नौ बार चुनाव लड़ा, जिसमें सात बार विजयी रहे। केवल दो बार सेठ श्रीकिशन दास से हारे। डॉक्टर मंगलसेन के बाद कांग्रेस के बत्रा बंधुओं का सीट पर दबदबा है। 1991 में सुभाष बतरा, 2000 व 2005 में शादीलाल, 2009 व 2019 में भारत भूषण बतरा विधायक बने। भाजपा के मनीष ग्रोवर 2014 में जीते, लेकिन 2019 में हार गए। अब भाजपा में ग्रोवर तो कांग्रेस में बीबी बतरा को ही टिकट का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है।
महम : ताऊ देवीलाल व दांगी लगा चुके हैं जीत की हैट्रिक, अब चेहरा बदलने की तैयारी
1990 में महम कांड के बाद हलका प्रदेश ही नहीं, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा। अब तक जाट समुदाय का ही हलके में दबदबा रहा है। 1982, 1985 व 1987 और आनंद सिंह दांगी ने 2005, 2009 व 2014 में जीत की हैट्रिक लगाई। लंबे समय तक हलके में कांग्रेस व इनेलो के बीच मुकाबला रहता था, कुछ समय से भाजपा भी उभरकर आई है। पार्टी ने शमशेर खरकड़ा को मैदान में उतारा,
लेकिन वे अब तक जीत नहीं सके हैं।
अब की बार पार्टी ने रणनीति बदली है। शमशेर खरकड़ा के साथ उनकी पत्नी राधा अहलावत ज्यादा सक्रिय हैं। लोकसभा चुनाव में भी राधा ने काफी मेहनत की। दूसरी तरफ 2019 में निर्दलीय बलराज कुंडू ने जीत हासिल की थी। अब की बार कांग्रेस आनंद सिंह दांगी या उनके बेटे बलराम दांगी, भाजपा शमशेर खरकड़ा या उनकी पत्नी राधा अहलावत को टिकट दे सकती है। बलराज कुंडू का भी मैदान में फिर उतरना तय माना जा रहा है। हालांकि लोकसभा चुनाव में कुंडू ने पत्ते नहीं खोले और न ही सक्रिय नजर आए।
गढ़ी सांपला-किलोई : 24 साल से अजेय बने हुए हैं भूपेंद्र सिंह हुड्डा
लोकसभा चुनाव में पिता के हलके गढ़ी सांपला-किलोई से बेटे दीपेंद्र हुड्डा को कितने वोट मिलते हैं, इस पर हर किसी की निगाह है, क्योंकि भूपेंद्र सिंह हुड्डा 2000 से अब तक विधायक बनते आ रहे हैं। इनेलो के बंटवारे व पार्टी के जिला अध्यक्ष रहे सतीश नांदल के भाजपा में जाने से अब हलके में मुकाबला कांग्रेस व इनेलो नहीं, बल्कि कांग्रेस व भाजपा के बीच है। भाजपा ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के पूर्व मंत्री कृष्णमूर्ति हुड्डा व कुश्ती खिलाड़ी दीपक हुड्डा को पार्टी में शामिल कर हलके में जनाधार बढ़ाने का प्रयास किया। अब लोकसभा चुनाव परिणाम से पता चलेगा कि कांग्रेस व भाजपा के बीच वोटों का क्या अंतर रहता है। कांग्रेस में हुड्डा के अलावा टिकट का दावेदार दूर-दूर तक नजर नहीं आता, जबकि भाजपा में सतीश नांदल के साथ अब कृष्णमूर्ति हुड्डा भी टिकट मांग सकते हैं।