युक्रेन से लौटी मुस्कान का घर में आरती कर स्वागत करते परिजन। विज्ञप्ति
रोहतक। यूक्रेन से निकलकर सुरक्षित घर आना आसान नहीं था। वहां पूरा देश भाग रहा है। जान बचाने के लिए बंकरों में शरण लेनी पड़ रही है। ट्रेन ही आवागमन का एकमात्र साधन है। इस कारण यहां लोगों की भीड़ बनी हुई है। घर के लिए 28 फरवरी को कीव से बड़ी मुश्किल से ट्रेन पकड़ी थी। रविवार को सातवें दिन अपने घर पहुंची पाई हूं। हमें तीन दिन यूक्रेन से बाहर निकलने में ही लग गए। यह कहना है चिन्यौट कॉलोनी की मुस्कान का। घर लौटने पर अमर उजाला से हुई बातचीत में एमबीबीएस तीसरे वर्ष की इस छात्रा ने युद्ध के हालात साझा किए। घर पहुंचने पर परिजनों ने बेटी की आरती उतारी व फूल मामला पहना कर उसका स्वागत किया।
छात्रा ने कहा कि यूक्रेन के हालात काफी खराब हैं। लोग जान बचाने के लिए भाग रहे हैं। कोई बंकर तलाश रहा है तो कोई परिवहन के साधन। खाने-पीने का सामान भी बड़ी मुश्किल से मिल पा रहा है। किसी की जेब में रुपये नहीं हैं तो किसी को डॉलर का एक्सचेेंज नहीं मिल रहा है। स्टेशन पर दौड़ते भागते भीड़ में कोई डॉलर से एक्सचेंज कराने में सफल हो जाए तो वह टिकट खरीद कर कुछ खा-पी लेता है। हम 28 फरवरी को कीव से निकले थे। बड़ी मुश्किल से ट्रेन में जगह मिली। मेरी कई दोस्त वहीं छूट गई। ट्रेन में 12 घंटे की यात्रा खड़े रह कर ही करनी पड़ी। किसी तरह लवीव स्टेशन पहुंचे। यहां आगे की ट्रेन नहीं मिली। इस कारण 20 दोस्तों ने 4500 रुपये प्रति के हिसाब से चौप के लिए बस किराए पर की। चौप बार्डर स्टेशन पर भी जबरदस्त भीड़ मिली। यहां से बड़ी मुश्किल से हंगरी पहुंचे। हंगरी में कुछ राहत मिली। यहां खाने पीने के अलावा आराम करने की जगह मिली। यहां से बुडापेस्ट पहुंची। बुडापेस्ट में तीन दिन रुकना पड़ा। रविवार को फ्लाइट में जगह मिली तो घर पहुंच पाई। स्टेशन पर भीड़ के कारण लोगों को खाने के पैकेट तक वहीं छोड़ने पड़े। बाद में दोस्तों से खाना साझा किया। अब घर आकर सुकून मिला है।