रोहतक। ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र आते ही देव कॉलोनी निवासी एयरफोर्स से सेवानिवृत्त बलवान सिंह सिंधु (80) को अपने जांबाज पोते की याद आ जाती है। ऑपरेशन सिंदूर का हिस्सा रहे रोहतक के जांबाज सपूत स्क्वाड्रन लीडर लोकेन्दर सिंधु ऑपरेशन सिंदूर के दो माह बाद जगुआर क्रैश हादसे में बलिदान हो गए थे।
ऑपरेशन सिंदूर के एक वर्ष पूरा होने पर दादा बलवान सिंधु बलिदानी पोते लोकेन्दर सिंधु को याद कर भावुक हो गए। बोले- लोकेन्दर बेहद जांबाज और दिलेर थे। उन्होंने खुद अपने हाथों से उसे तैयार किया था।
बलवान ने बताया कि जब लोकेन्दर के पिता जोगेंद्र एमडीयू में क्लर्क और मां टीचर थीं, तब उन्होंने एयरफोर्स से सेवानिवृत्त होने के बाद पोते को सेना में भेजने का निर्णय लिया। जब वे बरेली कैंट में थे तो वहां उनके दोस्त रामफल पूनिया मिले जो बाद में ब्रिगेडियर बन गए थे। उन्होंने ब्रिगेडियर से लोकेन्दर की बातचीत कराई। उन्होंने बताया कि वे कमीशन में जा सकते हैं।
मधुमक्खियों के हमले से भी नहीं घबराए थे
दादा बलवान बताते हैं, 16 साल की उम्र में वे लोकेन्दर को लेकर एमडीयू की तरफ किसी काम से जा रहे थे। वहां मधुमक्खियों ने हमला बोल दिया था। किसी तरह वे लोकेन्दर को लेकर पीजीआई पहुंचे। डॉक्टरों ने बताया कि अगर आधा घंटा और देरी से आते तो जान पर बन सकती थी। इसके बावजूद लोकेन्दर घबराया नहीं। साइकिल से लेकर मोटरसाइकिल चलानी तक खुद उन्होंने ही पोते को सिखाई थी।
दादा हिसार गए, तब लोकेन्दर ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर में लगी है ड्यूटी
बलवान सिंह ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वे रिश्तेदारी में हिसार गए थे। वहां पर आए लोकेन्दर ने बताया था कि दादा मेरी ड्यूटी ऑपरेशन सिंदूर में लगी है। जहां भी कोई एयर स्ट्राइक होती है, वहीं जाना होता है।