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बंगाली नाटक सवेरे की आस में कठपुतियों के खेल के जरिए दिखाया महामारी का भयंकर रूप

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नाटक प्रस्तुति देती कलाकार। - फोटो : RohtakCity
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रोहतक। एक साल की चुप्पी के बाद सप्तक कल्चरल सोसायटी ने कोरोना को चैलेंज देते हुए सोमवार को संडे थियेटर की पहली प्रस्तुति बांग्ला एकल नाटक सवेरे की आस (भोरेर आशाएं) का मंचन कराया। आईएमए सभागार में नाटक का मंचन किया गया। आकाशवाणी केंद्र निदेशक संजय बाली मुख्य अतिथि रहे। एमडीयू निदेशक जनसंचार सुनीत मुखर्जी ने नाट्य संध्या की अध्यक्षता की। नाटक करने वाली टीम रंग संस्कार कोलकाता से आई। नाटक में महामारी के दौरान हुई त्रासदी को दर्शाया गया है। टीम नाटक के दो शो अलवर व जयपुर में कर चुकी हैं व तीसरा शो रोहतक में हुआ।
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संजय चटोपाध्याय के इस नाटक का निर्देशन मोनालिसा दास ने किया और नाटक का एकमात्र किरदार भी उन्होंने ही निभाया। संगीत प्रद्युत चटर्जी ने दिया, जिसका संचालन संदीप शर्मा ने किया। प्रकाश व्यवस्था यामिनी शर्मा की रही और नाट्य संयोजन राजस्थान के प्रख्यात रंगकर्मी डॉ. देशराज मीणा ने किया। मोनालिसा दास का अभिनय इतना जीवंत रहा कि भाषा समझ में न आने के बावजूद दर्शकों ने नाटक का भरपूर आनंद लिया। संजय बाली ने कहा कि साल भर के इस सप्ताहांत फेस्टिवल में शहर के कलाप्रेमियों को अच्छे नाटक देखने को मिलेंगे। उन्होंने कहा कि सर्दी के इस मौसम में भी जो लोग नाटक देखने आए हैं, वही इस आयोजन की असली ताकत हैं। सुनीत मुखर्जी ने आयोजकों की हिम्मत को दाद देते हुए कहा कि कोरोना के भय के इस माहौल में ऐसा आयोजन करवाना बड़े हौसले का काम है।
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ये है कहानी-
छोटे शहर में रहने वाली युवती जो एक कपड़ों की दुकान चलाती है। लॉकडाउन के बाद वह अपनी दुकान को फिर से खोलने के लिए उत्साहित है, जो पिछले 8 महीने से बंद थी। वर्षों से उसके परिवार की आजीविका का एकमात्र साधन रही इस दुकान को खोलने के बाद युवती उसकी साफ-सफाई और कपड़ों की सजावट करती हुई वहां रखे पुतलों से बात करना शुरू कर देती है। वह बताती है कि किस तरह उसने कॉलेज की पढ़ाई की और पढ़ाई के बाद दुकान की जिम्मेदारी लेते हुए इस छोटी सी दुकान को शहर की जानी मानी दुकान में परिवर्तित कर दिया। उसके पिताजी अपने दोस्तों के साथ दुकान में शतरंज खेलते थे। इन सभी स्मृतियों को पुतलों के साथ साझा करते हुए वह सोचती है कि कैसे उसने अचानक आए कोरोना काल के अंतहीन लगने वाले लॉकडाउन को झेला और कैसे अनलॅाक के बाद के मानसिक संघर्ष, भावनात्मक उथल पुथल एवं सामाजिक अलगाव को जिया, जो अब तक जारी है। अलगाव को कायम रखने कि जिद में पिता को साथियों से अलग करने की आत्मग्लानि की टीस मन में रहती है। कोरोना की वजह से हुई पिता की मुत्यु के लिए भी वह स्वयं को ही उतरदाई ठहराती है। कोविड के चलते शारीरीक, मानसिक व सामाजिक विकृतियां नए सिरे से जन्म ले रही हैं। करीबी मित्र और रिश्तेदार भी अब अजनबी से लगने लगे हैं। मास्क, दस्ताने, सैनिटाइजर हमारे साथ जुड़ गए हैं। फेस कवर और मुखौटा अंधेरी प्रथाओं का प्रतीक नहीं रहे। यह दुनिया मानों लंगड़ा कर बस किसी तरह चल रही है, पर इस अंधेरे दौर में भी एक आशा है- आने वाले सवेरे की आशा...!
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ये रहे मौजूद
इस मौके पर सप्तक के अध्यक्ष विश्वदीपक त्रिखा, सचिव अविनाश सैनी, तन्वी पठानिया, सम्पूर्ण बागड़ी, गुलाब सिंह खांडेवाल, सर्वजीत अहलूवालिया, दीपक भारद्वाज, डॉ. हरीश वशिष्ठ, अंजवी हुड्डा, विकास रोहिल्ला, सुरेंदर शर्मा, कपिल भारद्वाज, सौरभ, पवन गहलावत विशेष रूप से उपस्थित रहे। मंच संचालन सुजाता रोहिल्ला ने किया।
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