समाज में आधुनिकता के साथ लोगों के अंदर उम्मीद, सपने और कुछ करने की चाह बढ़ रही है।
मगर जब में यह सब बातें पूरी होती नजर नहीं आती तो इंसान तनाव में रहने लगता है।
ऐसे में आत्महत्या के मामलों में इजाफा हो रहा है। जिले में हर महीने औसतन 10 लोग आत्महत्या कर रहे है।
इनमें महिला और पुरुष दोनों की संख्या लगभग समान है।
ये हैं आंकड़े
करीब पांच प्रतिशत लोग फंदा लगाकर आत्महत्या करते हैं।
दो प्रतिशत लोग जहरीला पदार्थ का सेवन कर जिंदगी समाप्त करते हैं।
एक प्रतिशत लोग ट्रेन के आगे आकर आत्महत्या करते हैं।
18 से 40 की उम्र के लोग जल्द हार जाते हैं जिंदगी से
हैरानी कर देने वाली बात है कि जिम्मेदारी निभाने वाले युवा ही सबसे ज्यादा आत्महत्या की राह चुनते हैं। आंकड़ों में सामने आया कि तनाव की स्थिति होने पर युवा वर्ग इस तरह के कदम उठाता है।
ये हैं वजह
आत्महत्या के मामलों में इन दिनों सबसे ज्यादा दहेज प्रताड़ना और पढ़ाई का अनावश्यक दबाव की वजह से सामने आई है। मनोवैज्ञानिकों की माने तो नशे की लत भी लोगों को आत्महत्या के लिए मजबूर करती है। क्योंकि मानसिक स्थिति पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं होने के कारण व्यक्ति नकारात्मक चीजों के बारे में ज्यादा सोचता है। इसके बाद वह लगातार डिप्रेशन से घिर जाता है।
घटनाएं
1. एमसीडी कर्मचारी ने लगाया फंदा
शुक्रवार को गांव बोहर में परिजनों के द्वारा शराब पीने से मना करने पर 35 वर्षीय बिजेंद्र सिंह ने फं दा लगाकर जान दे दी। वह दिल्ली एमसीडी में चालक था।
2. दहेज प्रताड़ना के चलते लगाया फंदा
6 अगस्त को गांव चिड़ी में विवाहिता सीमा ने चुन्नी का फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली थी। पानीपत के गांव अडियाना निवासी मायके वालों ने आरोप लगाया था कि ससुराल पक्ष सीमा को दहेज के लिए प्रताड़ित करता था। 7 अगस्त को पीली कोठी निवासी विवाहिता दीपमाला ने दहेज प्रताड़ना से तंग आकर फांसी लगाकर जान दे दी।
परीक्षा परिणाम के समय बढ़ती है काउंसिलिंग
पीजीआई में मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. राजीव गुप्ता ने बताया कि परीक्षा परिणाम के समय अभिभावक अपने बच्चों को तनाव से दूर रखने के लिए काउंसिलिंग के लिए लेकर आते है। ताकि परिणाम आने के बाद बच्चा कोई गलत कदम न उठा सके। इसी तरह घर में अकेले रहने वाले बुजुर्ग भी रूटीन में काउंसिलिंग पर आते रहते है।
- ऐसे करे तनाव दूर
डॉ. राजीव गुप्ता के अनुसार घरों में अकेले रहने वाले लोगों को आसपास के लोगों से बातचीत करती रहनी चाहिए। फेसबुक और सोशल साइट्स के माध्यम से बातचीत को दूर रखने का प्रयास करना चाहिए। अभिभावकों को परिजनों से विचार-विमर्श करना चाहिए। ताकि बच्चों की परेशानियों को आसानी से समझा जा सके।