रोहतक। कहानी रचते समय अपनी संस्कृति व सहज ज्ञान से जुड़े रहना जरूरी है। कहानियां जब आपकी जड़ों और सहज ज्ञान से निकलती हैं तभी उनमें आत्मा होती है। दक्षिण भारत की ब्लॉकबस्टर फिल्मों को देखिए वे दूरदराज के इलाकों की कहानियां कह रही हैं।
परंपराओं और क्षेत्रीय संस्कृति को प्रतिबिंबित कर रही हैं। यही कारण है कि उनका सिनेमा पूरे देश में इतनी गहराई से गूंजता है। यह कहना है लेखक, निर्देशक व निर्माता अश्विनी चौधरी का। वह वीरवार को दादा लख्मीचंद राज्य प्रदर्शन एवं दृश्य कला विश्वविद्यालय (डीएलसी सुपवा) में कुलपति डॉ. अमित आर्य के निमंत्रण पर कैंपस का दौरा करने आए थे।
हरियाणा में जन्मे व पले-बढ़े लेखक ने कहा कि सहायक निर्देशक के रूप में अपना कॅरिअर शुरू किया। लाडो के लिए सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता। अपनी फिल्मों धूप, सिसकियां, गुड बॉय बैड बॉय, जोड़ी ब्रेकर्स एंड सेटर्स के साथ-साथ लाखों में एक, जिंदगी खट्टी-मीठी और रिश्तों का चक्रव्यूह जैसे लोकप्रिय टेलीविजन धारावाहिकों के लिए काम किया है। वर्तमान में गोल्डन रेशियो फिल्म्स के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं।
हरियाणवी फिल्म उद्योग की संभावनाओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार ने हरियाणा में फिल्म निर्माण के लिए कई प्रोत्साहन शुरू किए हैं। असली चुनौती उनका विवेकपूर्ण उपयोग करने में है।
जब तक फिल्म निर्माता नए विचार और गुणवत्तापूर्ण विषय वस्तु नहीं लाते तब तक हरियाणा से मुख्यधारा और गुणवत्तापूर्ण सिनेमा का उभरना मुश्किल होगा। राज्य में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। डीएलसी सुपवा पहले से ही सिनेमाई कौशल का केंद्र है।
कुलपति डॉ. अमित आर्य ने कहा कि डीएलसी सुपवा में हमारा प्रयास हमेशा से छात्रों को सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ कलाकारों से परिचित कराना रहा है। कुलसचिव डॉ. गुंजन मलिक ने कहा कि इस तरह के आयोजन छात्रों को यह समझ देते हैं कि सिनेमा केवल ग्लैमर के बारे में नहीं है बल्कि कड़ी मेहनत, ईमानदारी और प्रासंगिक कथाओं के माध्यम से दर्शकों से जुड़ने के बारे में है।