रोहतक। जब सूर्य देव बृहस्पति की राशि यानी धनु या फिर मीन राशि में प्रवेश करते हैं तभी से खरमास की शुरुआत मानी जाती है। इसमें शुभ कार्य या मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। कई नियमों का पालन भी किया जाता है ताकि साधक को नकारात्मक परिणाम न मिलें। साल का दूसरा और अंतिम खरमास 15 दिसंबर से शुरू हो रहा है, जिसका समापन 14 जनवरी को होगा। सनातन धर्म में इस दौरान शादी-विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन संस्कार समेत सभी मांगलिक कार्यों की मनाही होती है। इस अवधि में सूर्यदेव और भगवान विष्णु की पूजा होती है।
इस वजह से नहीं किए जाते हैं शुभ कार्य
ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, जब सूर्य देव बृहस्पति की राशि मीन या धनु में होते हैं, तब गुरु ग्रह की शक्तियां कम हो जाती हैं। वहीं ज्योतिष शास्त्र में गुरु ग्रह को भाग्य के कारक के रूप में देखा जाता है। ऐसे में यदि इस दौरान कोई भी शुभ कार्य किया जाए, तो उसका शुभ फल प्राप्त नहीं होता। यही कारण है कि खरमास में शुभ या मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।
खरमास में करें बृहस्पति चालीसा का पाठ
दुर्गा भवन मंदिर के पुजारी आचार्य मनोज मिश्रा ने बताया कि खरमास के दौरान साधक को तामसिक भोजन से भी दूरी बनानी चाहिए। इस दौरान रोजाना बृहस्पति चालीसा का पाठ करने से साधक को सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसी के साथ भगवान विष्णु और सूर्य देव की आराधना करनी चाहिए। जरूरतमंद लोगों को अपनी क्षमता अनुसार दान दें और भोजन कराएं। इन सभी कार्यों से आपके ऊपर ईश्वर की कृपा बनी रहती है। खरमास में सूर्य देव को जल चढ़ाने का विशेष महत्व माना गया है। ऐसे में जल में थोड़ी सी रोली और गुड़हल का फूल डालकर सूर्य भगवान को अर्घ्य दें। अर्घ्य के दौरान ॐ घृणिः सूर्याय नमः मंत्र का जप करते रहें।