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दिवस विशेष रोहतक में बायोफ्यूल की पर्याप्त संभावनाएं, तकनीक पर करना होगा काम : डॉ. रचना

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12- डॉ. अर्चना भटेरिया।
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रोहतक। रोहतक में गेहूं, धान और अन्य फसलों के अवशेषों से बायोगैस, बायोमास पैलेट्स, बायोब्रिक्स और बायोएथेनॉल जैसे जैव ऊर्जा उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इसकी शहर में पर्याप्त संभावनाएं भी हैं, बस तकनीक पर काम करना होगा। इससे कृषि अवशेषों के बेहतर प्रबंधन के साथ पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को कम किया जा सकता है। किसानों को भी अतिरिक्त आमदनी का जरिया मिल सकता है। इसके लिए किसानों, प्रशासन, उद्योग और आम नागरिकों को मिलकर काम करना होगा। यह कहना है एमडीयू रोहतक में पर्यावरण विज्ञान की प्रोफेसर डॉ. रचना भटेरिया का।
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डॉ. रचना ने बताया कि रोहतक के सामने वायु प्रदूषण बड़ी चुनौती है। दिवाली के दौरान एक्यूआई बढ़ने पर इसका असर साफ दिखाई देता है। कृषि अवशेष जलाना भी प्रदूषण की बड़ी वजह है। ऐसे में फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन जरूरी है। रोहतक में कृषि अवशेष पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होने के कारण यहां जैव ईंधन तैयार करने की अच्छी संभावनाएं हैं।

पराली को कचरा नहीं, उपयोगी उत्पाद मानें

डॉ. रचना ने कहा कि किसानों को पराली को कचरा समझकर जलाने के बजाय उपयोगी उत्पाद के रूप में देखना होगा। किसान कृषि अवशेष उन उद्योगों या कारखानों तक पहुंचा सकते हैं, जहां बायोमास की जरूरत होती है। इससे उन्हें प्रति टन के हिसाब से नियमित और समय पर भुगतान मिल सकता है। उन्होंने बताया कि पेट्रोल में भी जैव ईंधन के मिश्रण का इस्तेमाल शुरू हो चुका है, हालांकि इसे पूरी तरह पेट्रोल का विकल्प बनाना संभव नहीं है।
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आम नागरिक भी निभाएं अपनी भूमिका
उन्होंने कहा कि आम नागरिकों के स्तर पर सबसे जरूरी काम गीले और सूखे कचरे का अलगाव है। जैविक कचरे से कंपोस्ट बनाया जा सकता है और बायोगैस प्लांट में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि घरों से अलग-अलग एकत्र किया जाने वाला गीला और सूखा कचरा आगे भी अलग-अलग रखा जाए।
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