महम। कस्बे के दक्षिण दिशा में चोर की बावड़ी के नाम से प्रसिद्ध ऐतिहासिक धरोहर का निर्माण मुगल काल में किया गया था। इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो इसका निर्माण 1958-59 में शाहजहां के चौबेदार सैदु कलाल ने करवाया था। यह वही काल था जब मुगल बादशाह शाहजहां के उत्तराधिकारी के तौर पर औरंगजेब ने गद्दी संभाली थी ।
इस समय उसने अपने भाइयों को मौत के घाट उतारकर पिता को कैद कर लिया था। बताया जाता है सैदु कलाल घोड़ों का व्यापारी भी था। विदेशों से घोड़े खरीदकर भारत की रियासतों के राजाओं को बेचता था। बावड़ी में घोड़ों को 100 से 150 फीट तक सीढ़ियों से नीचे उतरने के बाद घोड़े व व्यापारियों के लिए आराम करने की जगह बनाई गई थी। वहीं पर बने कुएं से निकाल कर घोड़ों को पानी पिलाया जाता था और चड़स ( चमड़े का बड़ा सा थैला, जिसमें पानी भर कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता था।) पानी का भरकर घोड़े पर लादकर ले जाते थे। यह पानी रास्ते में प्यास बुझाता था।
1923 में पुरातत्व विभाग ने घोषित किया राष्ट्रीय धरोहर
पुरातत्व विभाग ने 1923 में बावड़ी को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करते हुए संरक्षित कर दिया था। 1982 में प्रदेश के मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल के समय इसे दार्शनिक स्थल बनाने के प्रयास हुए। इसके तहत विभाग ने इसका पानी निकालने की कोशिश की।लेकिन, उससे इसकी दीवारों को नुकसान होने लगा और बावड़ी के नीचे धंसने के डर से पानी निकालना बंद कर दिया गया।
300 मीटर तक भवन निर्माण पर है रोक
बावड़ी के चारों ओर 300 मीटर तक भवन निर्माण पर रोक है। अब भी इसके चारों ओर भारतीय पुरातत्व विभाग की ओर से 300 मीटर तक विभाग ने पत्थर लगाकर संरक्षित स्मारक का बोर्ड लगाकर इस क्षेत्र को विनियमित क्षेत्र दर्शाया गया है। लेकिन,इसके चारों ओर कॉलोनी बस गई है। हर रोज नए निर्माण हो रहे हैं। विनियमित क्षेत्र के अंदर मकान बनाकर रह रहे लोगों का कहना है जब वे जमीन के मालिक हैं तो वे निर्माण क्यों नहीं कर सकते। विभाग ने किसी प्रकार का मुआवजा नहीं दिया है। ऐसे में भवन निर्माण भी नहीं रुक रहे हैं और न ही बावड़ी को दार्शनिक स्थल बनाया जा रहा है।
फोटो 01 महम में स्थित ऐतिहासिक बावड़ी का दृश्य
02 बावड़ी से 300 मीटर दूर बहलबा रोड के नजदीक भिवानी रोड पर लगा विभाग का बोर्ड