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Shafali Verma: प्लास्टिक के बल्ले से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट तक, पिता की सीख और संघर्ष से चमकी शैफाली की प्रतिभा

Mon, 03 Nov 2025 01:20 PM IST
शाहिल शर्मा माई सिटी रिपोर्टर रोहतक

सार

भारतीय ओपनर प्रतिका रावल के चोटिल होने के बाद टीम मैनेजमेंट ने अचानक शेफाली को सेमीफाइनल में मौका दिया। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सेमीफाइनल में वह कुछ खास नहीं कर सकीं, लेकिन उनके शॉट्स में आत्मविश्वास दिखा। हालांकि, वर्ल्ड कप के फाइनल में शेफाली ने दिखा दिया कि वो अब भी टीम की ‘एक्स फैक्टर’ खिलाड़ी हैं। शेफाली वर्मा ने बल्ले से 78 गेंद में 87 रन बनाए और दो महत्वपूर्ण विकेट भी झटके। 
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शेफाली वर्मा - फोटो : ANI
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विस्तार
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घनीपुरा निवासी संजीव वर्मा की बेटी शैफाली वर्मा का सफर गली क्रिकेट से भारतीय महिला क्रिकेट टीम तक प्रेरणादायक रहा है। बचपन में प्लास्टिक के बल्ले से खेलने वाली यह लड़की आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का परचम लहरा रही है। क्रिकेट के शुरुआती गुर पिता से सीखे और जब भी खेल को लेकर कोई निर्णय लेना होता है, आज भी पिता से सलाह जरूर लेती हैं। अंडर-19 महिला विश्व कप की विजेता  शैफाली ने अपने संघर्ष और समर्पण से यह साबित किया कि सीमित संसाधन भी सफलता की राह में रुकावट नहीं बनते।

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प्लास्टिक के बल्ले से हुई क्रिकेट की शुरुआत 

पेशे से ज्वेलर्स संजीव वर्मा बताते हैं कि परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी लेकिन शैफाली का क्रिकेट के प्रति जुनून अडिग था। बचपन में वह प्लास्टिक के बल्ले से गली में खेलती थी। खेलते-खेलते उसने अपनी तकनीक और टाइमिंग दोनों को बेहतर बनाया। पिता ने बताया-जब वह छोटी थी, तबसे उसका ध्यान सिर्फ क्रिकेट पर था। हर दिन बैटिंग का अभ्यास करती और खुद को बेहतर बनाती रहती थी।

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15 साल की उम्र में टीम में बनाई जगह 

शैफाली ने 15 साल की उम्र में भारतीय महिला टी-20 टीम में जगह बनाई थी। जून 2021 तक वह भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली सबसे कम उम्र की महिला क्रिकेटर बन गईं। उनके पिता याद करते हैं कि एक बार अभ्यास के दौरान बल्ला टूट गया था। तब शैफाली ने कहा-पापा, इस बल्ले से गेंद बाउंड्री पार नहीं जाएगी। इसके बाद पिता स्कूटर से मेरठ तक गए और वहां से छह ब्रांडेड बल्ले लेकर लौटे। उन्होंने कहा-उसकी आंखों में क्रिकेट था, मैं कैसे रोक लेता उसे।

लड़कों के साथ खेलकर सीखी हिम्मत

शैफाली का आत्मविश्वास उस समय और बढ़ा जब 2013 में सचिन तेंदुलकर लाहली स्टेडियम में रणजी ट्रॉफी खेलने आए। सचिन को देखने के बाद उसने तय कर लिया कि उसे क्रिकेटर बनना ही है। शुरुआती अभ्यास के दौरान वह लड़कों के साथ क्रिकेट खेलती थी ताकि उसकी बल्लेबाजी मजबूत हो। कोचिंग लेने के बाद उसे अकादमी भेजा गया जहां उसने अपने खेल को और निखारा। क्रिकेट के लिए शैफाली ने अपने बाल तक कटवा लिए ताकि खेलते समय ध्यान सिर्फ मैदान पर रहे। बाद में उसके स्कूल ने लड़कियों की क्रिकेट टीम बनाई जिसमें शैफाली ने अहम भूमिका निभाई।
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