रोहतक। हुनर चाहे जो भी हो एक दिन रोजगार का जरिया बन सकता है। सिलाई का ऐसा ही एक हुनर मूर्ति के लिए स्वरोजगार बना हुआ है। वैभव लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह से जुड़ी मूर्ति अब इस स्वरोजगार से प्रति माह आठ हजार रुपये तक आमदनी कर रही हैं।
मूल रूप से गढ़ी बोहर गांव निवासी मूर्ति बताती हैं कि उनकी शादी 1996 में जींद के नरवाना निवासी शिवनारायण से हुई। शादी के बाद वर्ष 2005 में वह रोहतक के अस्थल बोहर में किराये पर रहने लगे। पति मजदूरी करते थे तो फिर एक समय ऐसा भी आया, जब घर खर्च चलाने के लिए उन्होंने सिलाई का स्वरोजगार अपनाया।
वर्ष 2014 में वह स्वयं सहायता समूह से जुड़ गई तो बुटीक कला में निखार आया। दरअसल, इससे पहले उन्होंने घर पर ही सिलाई काम सीखा था लेकिन कहीं ने कहीं झिझक बनी हुई थी। स्वयं सहायता समूह के शामिल होने के बाद उन्होंने इस झिझक को दूर किया और अब वे बेहतर कार्य कर रही है। वह दूसरी महिलाओं को भी सिलाई कला के स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर रही हैं।