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रोहतक की धरती से घटेगा प्लास्टिक का बोझ

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रोजमर्रा के जीवन में प्लास्टिक के अंधाधुंध इस्तेमाल ने पर्यावरण के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। प्रयोग के बाद जलने वाले प्लास्टिक का खतरनाक धुआं हवा में जहर घोल रहा है। ऐसे में एक एनजीओ ने रोहतक के गांवों को प्लास्टिक फ्री करने का बीड़ा उठाया है। सस्टेनेबिलिटी विजन फाउंडेशन ने मार्च 2020 में जिले के एक गांव से यह प्रोजेक्ट शुरू किया था। गांव में प्लास्टिक खरीद केंद्र खोला गया। लोगों से कहा गया कि वे प्लास्टिक को सड़कों पर फेंकने के बजाय उन्हें दो रुपये प्रति किलो में दें। इसका असर हुआ, लोग प्लास्टिक इकट्ठा करने लगे और गांव का गलियां साफ दिखने लगीं। उसके बाद एक-एक करके अब तक जिले के गांवों में 19 खरीद केंद्र खोले जा चुके हैं। संस्था के प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर विजय सरोहा ने बताया कि इस साल 15 और खरीद केंद्र खोलने की योजना है। पिछले वित्त वर्ष में संस्था ने 49 टन खतरनाक प्लास्टिक इकट्ठा किया। फिर सरकार के निर्देशानुसार डेराबस्सी, पंजाब के एक प्लांट में उसका निस्तारण कराया। उनकी संस्था 12 जिलों में काम कर रही है, वहां से कुल 417 टन प्लास्टिक का निस्तारण किया गया। इस साल रोहतक से 200 टन के निस्तारण का लक्ष्य है।
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घर-घर से इकट्ठा करना पड़ता है प्लास्टिक
विजय सरोहा ने बताया कि उनका एक केंद्र आसपास के गांवों के पांच हजार घर या 25 हजार आबादी को कवर करता है। केंद्र खोलने के बाद गरीब परिवार की एक महिला को ट्रेनिंग देकर उसको जिम्मेदारी दी जाती है, जिसे पहले तीन हजार रुपये प्रतिमाह, बाद में इंसेंटिव दिया जाता है। वह गांवों की महिलाओं को बताती है कि प्लास्टिक अलग से संभाल कर रखें। सक्षम युवा भी इस काम में मदद करते हैं। लोगों को यह विचार तो पसंद आया लेकिन शुरुआत में वह केंद्र नहीं आए, घर-घर जाकर प्लास्टिक इकट्ठा करना पड़ा। एक क्षेत्र में उनके वालंटियर दो से ढाई माह के बाद जाते हैं, तब लोग काफी प्लास्टिक इकट्ठा कर लेते हैं। 45 हजार घर कवर करने का लक्ष्य था, पर कोरोना के चलते 40 फीसदी ही हो सका, इस बार बढ़ाया जाएगा। एनजीओ की योजना है कि पहले तीन माह तो निवेश करना पड़ता है, उसके बाद केंद्र आत्मनिर्भर हो जाते हैं।
सबसे खतरनाक है मल्टी-लेयर्ड प्लास्टिक
विजय सरोहा ने बताया कि हमारे दैनिक उपयोग की चीजें जिन पैकिंग में आती हैं, उनमें सबसे खतरनाक मल्टी-लेयर्ड प्लास्टिक है। इसमें कुरकुरे, चिप्स, बिस्कुट, टॉफी, दूध की पैकिंग शामिल है। कुल प्लास्टिक का 67 फीसदी यही होता है। इसे जलाने पर पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचता है।
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बाती से उतारें नजर, जलाएं चूल्हा
प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर सरोहा ने बताया कि लोग आज भी घरों में चूल्हा या पानी व दूध गर्म करने के लिए जलाते समय प्लास्टिक का प्रयोग करते हैं। उन्हें देसी भाषा में समझाया गया कि बच्चों की नजर उतारने के लिए तेल की बाती का प्रयोग किया जाता है। तो पहले तेल की बाती से बच्चों की नजर उतारें, फिर उसी से चूल्हा जलाएं। लोग मानने लगे हैं।
रबर भी होगा शामिल
एनजीओ ने इस साल जून से प्लास्टिक के अलावा कुछ और वेस्ट चीजें भी अभियान में शामिल करने का फैसला किया। जिनमें रबर, रैक्सीन और थर्मोकोल शामिल हैं। साथ ही बेकार कपड़ों से बैग बनाने का काम भी शुरू किया जाएगा।
इस साल गोद लेंगे दो गांव
विजय सरोहा ने बताया कि इस साल दो गांव गोद लिए जाएंगे, जिनमें महम का बरहान शेखपुर तीतरी और सांपला का नयाबांस गांव शामिल हैं। दोनों गांवों में संस्था तीन महीने के लिए एक-एक वालंटियर नियुक्त करेगी। जो स्व-प्रेरित आदर्श ग्राम योजना के तहत दोनों गांवों को तीन माह में जीरो वेस्टेज में तब्दील करेंगे।
री-स्टोर अवर अर्थ है थीम
विश्व धरती दिवस की इस साल की थीम री-स्टोर अवर अर्थ रखी गई है। 1970 में अमेरिका में बड़ी संख्या में लोगों ने धरती के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने को अभियान की शुरुआत की थी। तब से हर साल 22 अप्रैल को विश्व धरती दिवस मनाया जाता है। इसमें इको सिस्टम को संभालने, पर्यावरण के बारे शिक्षित करने, प्लास्टिक का उपयोग घटाने, पौधरोपण बढ़ाने और लुप्त रो रही चीजों को संभालने पर फोकस किया जाता है।
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