रोहतक। अयोध्या में 22 जनवरी को भगवान श्रीराम के प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर चहुंओर वातावरण राममय हो गया है। राम की महिमा हमारी लोक संस्कृति में हो भी क्यों नहीं, क्योंकि भगवान रामचंद्र की सारी चेष्टाएं, धर्म, ज्ञान, नीति शिक्षक गुण, प्रभाव तत्वों से भरी हुई थी। वह साक्षात पूर्व ब्रह्म भगवान होते हुए भी मित्रों के साथ मित्रवत माता-पिता के साथ प्रयुक्त, स्त्री के साथ आदर्श पति, सेवकों के साथ आदर्श स्वामी और मुनी-ब्राह्मणों के चरणों में शिष्य बनकर व्यवहार करते थे, इसी कारण हरियाणा के घट-घट में राम बसे हैं। घर-घर में रोज सुबह-शाम राम कीर्तन होता है।
झज्जर के गांव गांव माजरा दूबलधन के डॉ. दयानंद कादियान ने बताया कि प्रदेश के शिल्पियों और चितेरों ने चीतों, थानों, मूर्तियों और भित्ति चित्र के जरिए राम सीता के जीवन पहलुओं को अपनी कूची से उकेरने का काम किया है। हर घर के सामने के दरवाजे राम-राम के सौण व चित्रांकन से राम सीता के प्रतीक सौभाग्यसूचक माने जाते हैं। राम के अनुकरणीय चरित्र को मृण मूर्तियों में ढालकर शिल्पियों ने समाज को शालीन और सशक्त बनाने का जो कार्य किया है, वह हर हाल में अद्वितीय है। बेरी, भिवानी, नांगलसिरोही, बड़वा, निडाना, छातर, महेंद्रगढ़, नारनौल और दूबलधन माजरा के शिवालों की बाहरी भित्ति पर बनी राम परिवार की मूर्तियां आज भी प्रत्येक चरित्र का सजीव बोध कराती हैं।
राम की दया तै मौज हो री सै...
लोकोक्तियों में राम को राम की दया तै मौज हो रही सै, राम करै सो हो, राम तो केभरा भूखा मारैगा, मेरा तो इस दुनिया में कोई नहीं राम में रूखाला सै और राम नै जो लिख दिया, वो ही होकर रहैगा और राम के दिए दिन सै आदि बहु प्रचलित शब्दावली है। हरियाणवी बोली को सार्थक करने का व्याकरणिक नुक्ता है राम। राम के बिना हरियाणवी को हम सार्थक ढंग से बोलने में कठिनाई महसूस करते हैं। हरियाणा के ग्रामीण अंचल में तो लोक चित्रांकन में राम कथा और राम परिवार का चित्रांकन हर जगह मिलेगा।
महम, बेरी में चितेरों का रामायण कला के अंकन में विशिष्ट योगदान
समूचे प्रदेश में लोक चितेरों ने समयानुसार अपनी बुद्धि विवेक से आवासीय भवनों, मंदिरों, छतरियों, ठाकुरद्वारों, हवेलियों, मठों, डेरों आदि की भित्ति पर रामजीवन झांकी से संबंधित चित्रण किया है। हरियाणा में 1830 से 1940 तक के बीच में चित्रित हरियाणा की भित्ति चित्रकला की शैली और प्रगति की कहानी कह रहे हैं। इन भित्ति चित्रों में रामायण को हूबहू दिखाने का प्रयास किया है। भिवानी, महम, बेरी, थानेसर, कैथल, जींद, महेंद्रगढ़, चिड़िया, नांगल सिरोही, रोहतक और हांसी हिसार में चितेरों का रामायण कला के अंकन में विशिष्ट योगदान रहा है।
माता भीमेश्वरी देवी मंदिर में हनुमान जी आकर्षक मूर्ति
बेरी की रामलीला की तरह बेरी के रामायण विषयक भित्ति चित्र की कला के मुंह बोलते प्रमाण है। रूडमल, लाला परशुराम के मंदिरों के सवालों और धर्मशाला की भित्ति पर राम परिवार का चित्र वर्णन दर्शाया है। लालू की मूर्ति कला से राम सीता और लव-कुश की मनमोहक मूर्तियां हैं। माता भीमेश्वरी देवी मंदिर और निराचा मंदिर में राम सेवक हनुमान की मुंह बोलती मूर्ति लालू द्वारा बनाई गई है। राम परिवार की मूर्ति उनके वंशज प्रेमचंद शर्मा द्वारा अद्वितीय बनाई गई है। बेरी की स्थापित कलाकार शुद्ध फ्रेंसको पद्धति के चित्र बनाने में सिद्धहस्त थे।चंद्रभान, सुंदरलाल, मनोहर लाल, शिवकरण, बिहारी, चंदगी, श्योकरण लालू आदि ने बेरी को राममय करने में अहम भूमिका निभाई।
करौंथा में गरीब दास के मठ में मृग के चित्र दर्शनीय
लालू द्वारा बनाए गए राम के चित्र बादली की हवेलियों में भी देखे जा सकते थे। बेरी के निकट बसे डीघल और करौंथा गांव में भी राम के चित्रों की बीच समृद्ध परंपरा रही है। डीघल की हवेली में राम बनवास, लक्ष्मण मूर्छा और करौंथा में गरीब दास के मठ में मृग के चित्र बड़े दर्शनीय रहे हैं। यह चित्र 25 साल पहले साफ देखे जा सकते थे, लेकिन अब इनके अस्तित्व के चिह्न भी नहीं मिलते। माजरा दूबलधन के श्री राम मंदिर में भी राम-सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां बड़ी अनुपम हैं। बौंद में दादू पंथियों के डेरे में रामचरित्र को दर्शाते भित्ति चित्र उपलब्ध थे।
जींदिया राज के महलों व रानी तालाब में चित्रों में राम कहानी
छातर गांव में स्थित नाथ पंथियों के डेरे में रामायण के सुंदरकांड से संबंधित चित्रावली थी, जिसकी चमक फीकी पड़ गई है। जींद और उसके चौतरफा बसे सबसे बड़े गांव में रामायण के कुछेक प्रकरणों को दिखाया गया था, पांडुलिपियों, राम राय, हॉट एवं मिर्चपुर गांवों की चौपालों, हवेलियों और शिवालों में एकाध चित्र दिखाई पड़ते हैं। जींदिया राज के महलों व रानी तालाब में राम कहानी चित्रों में देखी जा सकती है।
महेंद्रगढ़ में बनियों की हवेलियों पर राम के भित्ति चित्र
महेंद्रगढ़ और इसके आसपास के गांव में 60-70 साल पहले हरियाणवी चितेरों ने रामायण प्रसंगों को कुछ खास किस्म का भित्ति चित्रांकन का काम सिरे चढ़ाया था। इस काम के कुछ नमूने बचे हुए हैं। महेंद्रगढ़ में बनियों की हवेलियों के अलावा कनीना एवं गढ़ी महासर की छतरियां को राम मर्यादा और रावण के अहंकार को तल्लीनता के साथ भित्ति पर दर्शाया गया है। नारनौल में मेस्सरवाड़ मोहल्ले में बनी हुई कांचोवाले मंदिर में सीता के जरिए नारी सशक्तीकरण को बेबाकी से समझाया गया है। इस मंदिर में रामायण के कई प्रसंग दर्शनीय प्रतीत होते हैं। एक चित्र में जनक दुलारी माता सीता रावण पर आक्रोशित दिखाई दे रही है।
रेवाड़ी के सोलह राही तालाब स्थित छतरी में श्रीराम का चित्रांकन
रेवाड़ी के सोलह राही तालाब स्थित एक साहूकार की छतरी में राम को विष्णु के अवतार की अपेक्षा पूर्ण ब्रह्म के तौर पर दिखाया गया है। यही नंद सागर की पाल पर खड़ी छतरी में सीता पतिराम का लघु शैली का चित्र भी बड़ा सराहनीय रहा है। नाथों के मठ अस्थल बोहर में बाबा तोता नाथ की छतरी में हनुमान सारथी बनकर राम-लक्ष्मण को गंतव्य की ओर ले जा रहे हैं।
नांगल सिरोही, सोनीपत के भवन राम के चित्रों से अछूते नहीं
नांगल सिरोही, सोनीपत, करनाल, अंबाला, सिरसा और हिसार भी कलात्मक भवन राम के चित्रों से अछूते नहीं है। बेरी के निकट दूबलधन गांव के बीधसर तालाब पर गूगन जाट की छतरी के मुंडेर के नीचे कलात्मक ढंग से रंगीन अक्षरों डेढ़ सौ से ज्यादा बार राम-राम लिखकर सुंदर चित्रांकन कर रखा है। दशरथ नंदन के जीवन से संबंधित कई चित्र बढ़िया हालत में हैं, लेकिन मुख्य द्वार के टोडे के बीच में राम के चरणों में लिपटे हुए हनुमान का चित्र बड़ा मनोहारी है। इस चित्र में जनक दुलारी भी रामचंद्र के संग में दिखाई देती हैं। हनुमान के बाल कर्म से संबंधित और भी चित्र दिखाई देते हैं। भित्ति चित्रों से राम कथा जीवंत चित्रण हमारे चितेरों ने कलात्मक ढंग से किया है।
... बूझा कहो तो कातिक नहा लूं हो राम
हरियाणा के परिवेश का कोई भी पहलू राम की मौजूदगी के बिना अछूता नहीं मिलेगा। माजरा (दूबलधन) के चंदराम थानेदार की हवेली में राम कथा से संबंधित बहुत चित्र थे, उनमें लंका दहन तथा राम वनवास बहुत ही चित्र आकर्षक थे। सीता बनिया और काशी बनिया की हवेली तो राम कथा के चित्रालय थे। श्रीचंद, हीरा और ज्ञानी की हवेलियों के राम चित्रों की चर्चा पुरानी पीढ़ी के लोग करते थे। इस प्रकार हाली पाली गतेरी महिलाएं और कातिक नहाण आली बालाओं के लिए स्मरणीय रहे हैं राम। हरियाणवी लोकगीत में एक कन्या कार्तिक नहाने की आज्ञा इस प्रकार लेती है - परस चढ़ता मेरा बाबल बूझा कहो तो कातिक नहा लूं हो राम।