माई सिटी रिपोर्ट
रोहतक। हमारी आंतों में जीवाणु व विषाणु दोनों पाए जाते हैं। जीवाणु कैंसर सेल को मारने में मददगार हैं। आंत के जीवाणुओं को आंत में डालकर मरीज का इलाज करने पर उसकी सेहत सुधार लाना संभव है। यह दावा किया है भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के पूर्व महानिदेशक पद्म भूषण प्रो. एनके गांगुली ने। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में एसोसिएशन ऑफ माइक्रोबायोलोजिस्ट्स ऑफ इंडिया (एएमआई) के 63वें वार्षिक सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे पूर्व महानिदेशक ने अमर उजाला से हुई बातचीत में अपना शोध अनुभव साझा किया।
माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी का उपयोग संपोषणीय जीवन के लिए करने का आह्वान करते हुए गांगुली ने कहा कि एक तरह के कैंसर सेल को मारने में आंत के जीवाणु मददगार हैं। जबकि दूसरी तरह के सेल पर ये असरकारक नहीं हैं। इस ओर काम करने की जरूरत है। व्यक्ति व परिस्थिति के अनुसार बीमारी व जीवाणु या सेल अलग-अलग होते हैं। इस क्षेत्र में गहन शोध के जरिए जीवाणुओं के बेहतर उपयोग का रास्ता प्रशस्त किया जा सकता है।
फेफड़े के कैंसर में माइक्रोबायोम्स व मल्टीओमिक्स की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि विभिन्न चिकित्सीय पहल में माइक्रोब्स की उपयोगी भूमिका है। साथ ही भारत में ट्रांसलेशनल हेल्थ रिसर्च परिदृश्य पर भी प्रकाश डाला सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में विशिष्ट अतिथि पद्मश्री डाॅ. एनके अरोड़ा ने कहा कि चिकित्सीय अनुसंधान में माइक्रोबायोलॉजी की विशेष भूमिका है। प्रयोगशाला से संबंधित इंफ्रास्ट्रक्चर को सुदृढ़ करने की जरूरत है। विभिन्न वैज्ञानिक विषयों के विशेषज्ञों को मिलकर कार्य करना होगा, ताकि विभिन्न स्वास्थ्य संबंधित चुनौतियों का सामना किया जा सके।
सम्मेलन के अध्यक्ष एमडीयू के कुलपति प्रो. राजबीर सिंह ने कहा कि मानव कल्याणकारी शोध समय की जरूरत है। युवा शोधार्थियों को माइक्रोब्स के उपयोगी पहलुओं पर शोध करना चाहिए, ताकि इसका इस्तेमाल चिकित्सीय पहल के तहत किया जाए। कुलपति ने प्रयोगशालाओं के शोध को समाज-राष्ट्र में जमीन तक ले जाने की आवश्यकता जताई। इसी कड़ी में विवि अगले सत्र से पब्लिक हेल्थ विषय पर पाठ्यक्रम प्रारंभ करने जा रहा है।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में सम्मेलन संबंधी पुस्तिका का लोकार्पण किया गया। हरियाणा केंद्रीय विवि के पूर्व कुलपति एवं सम्मेलन अध्यक्ष प्रो. आरसी कुहाड़ ने कहा कि विद्यार्थियों को वैज्ञानिक सोच विकसित करने की जरूरत है। कोविड के दौरान वैज्ञानिकों व चिकित्सकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। माइक्रोबायोलॉजी में उच्च अध्ययन व शोध का उपयोग मानव कल्याण के लिए किया जाए। उन्होंने वैज्ञानिक क्षेत्र में वैदिक ज्ञान के उपयोग पर भी जोर दिया।
एमडीयू के डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. सुरेंद्र कुमार ने कहा कि भारत की प्राचीन सभ्यता में वैज्ञानिक ज्ञान का समावेश है। उन्होंने देश में प्राचीन दर्शन और आधुनिक विज्ञान में सामंजस्य की जरूरत को भी रेखांकित किया। एएमआई की अध्यक्ष प्रो. प्रवीण ऋषि व महासचिव प्रो. नमिता सिंह ने उद्घाटन सत्र में संबोधन किया। एमडीयू माइक्रोबायोलॉजी विभाग के अध्यक्ष व सम्मेलन के आयोजन सचिव डाॅ. कृष्णकांत शर्मा ने माइक्रोबियल टेक्नोलोजिज फॉर सस्टेनेबल बायोस्फेयर विषयक सम्मेलन के थीम पर प्रकाश डाला। आभार प्रदर्शन डीन, फैकल्टी ऑफ लाइफ साइंसेज प्रो. राजेश धनखड़ ने किया। मंच संचालन प्राध्यापिका डाॅ. महक डांगी ने किया।
उद्घाटन सत्र में विशेष रूप से शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार विजेता प्रो. जावेद एन. अग्रेवाला (आईआईटी, रोपड़), डाॅ. धीरज कुमार (आईसीजीईबी, नई दिल्ली) को सम्मानित किया गया। प्रो. जावेद एन. अग्रेवाला, डाॅ. धीरज कुमार ने तकनीकी सत्र में विशेष व्याख्यान दिया। पैनेशिया बायोटेक के एसोसिएट डायरेक्टर डाॅ. अमूल्य के पांडा ने वैक्सीनेशन संबंधित व्याख्यान दिया। टैगोर सभागार में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में डीन, सीडीसी प्रो. एएस मान समेत संकाय डीन, विभागाध्यक्ष, प्राध्यापक, शोधार्थी, विद्यार्थी उपस्थित रहे। इस तीन दिवसीय सम्मेलन में लगभग 1000 डेलीगेट्स भाग ले रहे हैं।