11 दिल्ली रोड पर मोटरसाइकिल में पंचर लगाती मुकेश देवी। संवाद
राेहतक। कोई महिला पंक्चर बनाए...यकीन नहीं होता न। लेकिन, मुकेश देवी ने 2006 में पति को दिल का दौरा पड़ने के बाद उनकी पंक्चर की दुकान संभालकर यह मिथक तोड़ दिया है। उन्होंने ताने सहे पर हिम्मत नहीं हारी। उनके प्रयासों से बच्चे पढ़-लिखकर मनचाहे सपनों को साकार कर रहे हैं।
परिवार के लिए शक्ति और संबल का पर्याय बनीं आदर्श नगर निवासी मुकेश देवी कहती हैं, कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता। इसी कारण पति जयभगवान को हार्ट अटैक आया तो वे उनकी टायर पंक्चर की दुकान संभालने लगीं। उस वक्त और कोई चारा भी नहीं था।
डॉक्टर ने पति को कोई काम करने से स्पष्ट मना कर दिया था। आमदनी कुछ थी नहीं। पंक्चर की दुकान पर बैठी तो लोगों ने ताने मारे। इन्हें अनसुना किया। तीनों बच्चों को पढ़ाया, शादी की। बड़ा बेटा दुकान पर बैठता है, छोटा कानून की पढ़ाई कर रहा है। आज लोग उनकी मिसाल देते हैं।
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